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bhagavat 4.19.30: ब्रह्माजी ने उन्हें संबोधित किया : हे याजको, तुम स्वर्ग के राजा इंद्र को नहीं मार सकते, यह कार्य तुम्हारा नहीं है। तुमको जान लेना चाहिए कि इंद्र भगवान की तरह ही हैं। वास्तव में वे भगवान के सबसे शक्तिशाली सहायक हैं। तुम इस यज्ञ के ज़रिए सभी देवताओं को प्रसन्न करना चाहते हो, लेकिन तुम्हें पता होना चाहिए कि ये सभी देवता स्वर्ग के राजा इंद्र के ही अंश हैं। तो फिर तुम इस महायज्ञ में उनका वध कैसे कर सकते हो?   |   bhagavat अध्याय 4.19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ   ।   bhagavat स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  4.19.30 
न वध्यो भवतामिन्द्रो यद्यज्ञो भगवत्तनु: ।
यं जिघांसथ यज्ञेन यस्येष्टास्तनव: सुरा: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी ने उन्हें संबोधित किया : हे याजको, तुम स्वर्ग के राजा इंद्र को नहीं मार सकते, यह कार्य तुम्हारा नहीं है। तुमको जान लेना चाहिए कि इंद्र भगवान की तरह ही हैं। वास्तव में वे भगवान के सबसे शक्तिशाली सहायक हैं। तुम इस यज्ञ के ज़रिए सभी देवताओं को प्रसन्न करना चाहते हो, लेकिन तुम्हें पता होना चाहिए कि ये सभी देवता स्वर्ग के राजा इंद्र के ही अंश हैं। तो फिर तुम इस महायज्ञ में उनका वध कैसे कर सकते हो?
 
Brahma addressed them thus: O Yajnas, you cannot kill Indra, the King of Heaven. This is not your task. You should know that Indra is like the Lord. In fact, he is the most powerful assistant of the Lord. You are trying to please all the demigods by this sacrifice, but you should know that all these demigods are parts and parcels of Indra, the King of Heaven. Then how can you kill them in this great sacrifice?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)