श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  4.19.22 
वीरश्चाश्वमुपादाय पितृयज्ञमथाव्रजत् ।
तदवद्यं हरे रूपं जगृहुर्ज्ञानदुर्बला: ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
तब पराक्रमी पृथु-पुत्र विजिताश्व उस घोड़े को लेकर अपने पिता के यज्ञ स्थान पर वापस आ गया। तभी से, कुछ कम समझ वाले लोगों ने झूठे संन्यासी का पहनावा अपनाना शुरू कर दिया। इसकी शुरुआत राजा इंद्र ने ही की थी।
 
Then the supremely brave son of Prithu, Vijayaswa, again took the horse and returned to the place where his father had sacrificed his life. Since that time, some men with limited knowledge have started wearing the garb of pseudo-sanyasis. It was King Indra who started this.
तात्पर्य
अनादि काल से, संन्यास आदेश में तृदंड धारण किया जाता रहा है। बाद में शंकरचार्य ने एकादंडी-संन्यास का प्रचलन किया। एक त्रिदंडी-संन्यासी वैष्णव संन्यासी होता है, और एक एकादंडी-संन्यासी मायावादी संन्यासी होता है। कई अन्य प्रकार के संन्यासी भी होते हैं, जिन्हें वैदिक अनुष्ठानों द्वारा स्वीकृति नहीं दी गई है। एक प्रकार का छद्म-संन्यास इंद्र द्वारा प्रचलित किया गया था जब उन्होंने राजा पृथु के महान पुत्र विजिताश्व के हमले से खुद को छिपाने की कोशिश की थी। अब विभिन्न प्रकार के संन्यासी हैं। उनमें से कुछ नग्न रहते हैं, और कुछ खोपड़ी और त्रिशूल रखते हैं, जिन्हें आमतौर पर कापालिक के रूप में जाना जाता है। इन सभी का प्रचलन कुछ व्यर्थ परिस्थितियों में किया गया था, और जिनके पास ज्ञान की कमी होती है, वे इन झूठे संन्यासियों और उनके ढोंग को स्वीकार कर लेते हैं, हालाँकि वे आध्यात्मिक उन्नति के लिए वास्तविक मार्गदर्शक नहीं होते हैं। वर्तमान समय में कुछ मिशनरी संस्थाओं ने वैदिक अनुष्ठानों का उल्लेख किए बिना कुछ ऐसे संन्यासियों को प्रस्तुत किया है जो पापी गतिविधियों में लिप्त रहते हैं। शास्त्रों द्वारा वर्जित पापी गतिविधियों में अवैध यौन संबंध, नशा, मांसाहार और जुआ शामिल हैं। ये तथाकथित संन्यासी इन सभी गतिविधियों में लिप्त रहते हैं। वे मांस और मांसाहार, मछली, अंडे और लगभग हर चीज खाते हैं। वे कभी-कभी इस बहाने शराब पीते हैं कि शराब, मछली और मांस के बिना आर्कटिक क्षेत्र के नजदीकी ठंडे देशों में रहना असंभव है। ये संन्यासी गरीबों की सेवा करने के नाम पर इन सभी पापी गतिविधियों को प्रस्तुत करते हैं, और परिणामस्वरूप गरीब जानवरों को टुकड़े-टुकड़े करके इन संन्यासियों के पेट में भेजा जाता है। जैसा कि निम्नलिखित छंदों में वर्णित है, ऐसे संन्यासी पाखंडी होते हैं। वैदिक साहित्य कहता है कि जो व्यक्ति भगवान नारायण को भगवान शिव या भगवान ब्रह्मा के स्तर पर रखता है, वह तुरंत पाखंडी बन जाता है। जैसा कि पुराणों में कहा गया है:

यस्तु नारायणं देवम्

ब्रह्म-रुद्रादि-दैवतैः

समत्वेनैव वीक्षते

स पाषंडी भवेद् ध्रुवं

कलियुग में पाखंडी बहुत प्रमुख हैं। हालाँकि, भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने संकीर्तन आंदोलन को प्रस्तुत करके इन सभी पाखंडियों को मारने की कोशिश की है। जो लोग कृष्ण भावनामृत संघ के इस संकीर्तन आंदोलन का लाभ उठाते हैं, वे खुद को इन पाखंडियों के प्रभाव से बचा पाएंगे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)