Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 4.19.20: फिर से अत्रि मुनि ने राजा पृथु के पुत्र को दिखाया कि इंद्र आकाश के रास्ते भाग रहा है। परम वीर पृथु-पुत्र ने फिर से उसका पीछा किया। लेकिन जब उसने देखा कि इंद्र ने अपने हाथ में जो दण्ड धारण कर रखा है, उसके ऊपर एक खोपड़ी लटकी हुई है और वह फिर से संन्यासी के वेश में है, तो उसने उसे मारना उचित नहीं समझा। | bhagavat अध्याय 4.19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ । bhagavat स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
फिर से अत्रि मुनि ने राजा पृथु के पुत्र को दिखाया कि इंद्र आकाश के रास्ते भाग रहा है। परम वीर पृथु-पुत्र ने फिर से उसका पीछा किया। लेकिन जब उसने देखा कि इंद्र ने अपने हाथ में जो दण्ड धारण कर रखा है, उसके ऊपर एक खोपड़ी लटकी हुई है और वह फिर से संन्यासी के वेश में है, तो उसने उसे मारना उचित नहीं समझा।
Atri Muni again showed King Prithu's son that Indra was running away through the sky. The supremely brave son of Prithu again chased him. But when he saw that the staff he was holding in his hand had a skull hanging from it and that he was again in the guise of a hermit, he did not deem it fit to kill him.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥