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bhagavat 4.19.18: विदुर जी, जब ऋषियों ने राजा पृथु के पुत्र के आश्चर्यजनक युद्ध कौशल को देखा तो वे लोग उसका नाम विजिताश्व रखने के लिए राजी हुए।   |   bhagavat अध्याय 4.19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ   ।   bhagavat स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  4.19.18 
तत्तस्य चाद्भुतं कर्म विचक्ष्य परमर्षय: ।
नामधेयं ददुस्तस्मै विजिताश्व इति प्रभो ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
विदुर जी, जब ऋषियों ने राजा पृथु के पुत्र के आश्चर्यजनक युद्ध कौशल को देखा तो वे लोग उसका नाम विजिताश्व रखने के लिए राजी हुए।
 
O great Vidur, when the sages saw the wonderful valour of the son of King Prithu, they all agreed to name him Vijayatashva.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)