श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.19.11 
चरमेणाश्वमेधेन यजमाने यजुष्पतिम् ।
वैन्ये यज्ञपशुं स्पर्धन्नपोवाह तिरोहित: ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
जब महाराज पृथु अंतिम अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, तब इंद्र ने अदृश्य रूप से यज्ञ के घोड़े को चुरा लिया। उसने राजा पृथु से ईर्ष्या के भाव से ही ऐसा किया।
 
When King Prithu was performing the last Ashwamedha Yagya, Indra became invisible and stole the yagya horse. He did this out of jealousy towards King Prithu.
तात्पर्य
राजा इन्द्र को शत-क्रतु के नाम से जाना जाता है, जो इस बात को इंगित करता है कि उन्होंने सौ अश्वमेध यज्ञ किये हैं। हमे यह जानना चाहिए कि यज्ञ में बलिदान किए गए जानवरों को मारा नहीं जाता था। यदि यज्ञ के दौरान वैदिक मंत्रों का उचित उच्चारण किया जाता था, तो बलिदान किया गया जानवर एक नए जीवन के साथ फिर से बाहर आता था। यही एक सफल यज्ञ की परीक्षा है। जब राजा पृथु सौ यज्ञ कर रहे थे, तो इन्द्र बहुत ईर्ष्यालु हो गया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि कोई उससे आगे निकले। एक साधारण जीव के रूप में, वह राजा पृथु से ईर्ष्या करने लगा और, खुद को अदृश्य बनाते हुए, उसने घोड़े को चुरा लिया और इस तरह यज्ञ के कार्य में बाधा डाल दी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)