श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  4.19.10 
इति चाधोक्षजेशस्य पृथोस्तु परमोदयम् ।
असूयन् भगवानिन्द्र: प्रतिघातमचीकरत् ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
राजा पृथु पूर्ण रूप से पुरुषोत्तम भगवान, जिन्हें अधोक्षज के नाम से भी जाना जाता है, पर आश्रित थे। राजा पृथु ने कई यज्ञ संपन्न किए, जिसके चलते उन्हें भगवान की कृपा से अलौकिक शक्तियां प्राप्त हुई। हालाँकि, स्वर्ग के राजा इंद्र को उनका यह वैभव बर्दाश्त न हुआ और उन्होंने उसमें बाधा डालने का प्रयास किया।
 
King Prithu was dependent on the Supreme Personality of Godhead who is called Adhokshaja. King Prithu had performed so many yagnas that he had prospered greatly by the grace of God. But his prosperity was not tolerated by the King of Heaven Indra and he tried to create obstacles in it.
तात्पर्य
इस श्लोक में तीन महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं जो कि अधोक्षज, भगवान इंद्र और पृथोह शब्दों में व्यक्त किये गये हैं। महाराजा पृथु भगवान विष्णु के अवतार हैं, फिर भी वे भगवान विष्णु के परम भक्त हैं। भगवान विष्णु के शक्तिशाली अवतार होने के बावजूद भी वे एक जीवित प्राणी हैं। जैसे कि, उन्हें भगवान के परम व्यक्तित्व का भक्त होना चाहिए। यद्यपि कोई भगवान के परम व्यक्तित्व द्वारा सशक्त है और अवतार है, फिर भी उसे भगवान के परम व्यक्तित्व के साथ अपने अनादि संबंध को नहीं भूलना चाहिए। कली-युग में कई स्व-घोषित अवतार हैं, दुष्ट हैं, जो स्वयं को भगवान के परम व्यक्तित्व के रूप में घोषित करते हैं। भगवान इंद्र शब्द बताते हैं कि एक जीवित प्राणी भी इंद्र के समान प्रभावशाली और शक्तिशाली हो सकता है, क्योंकि राजा इंद्र भी भौतिक दुनिया में एक सामान्य जीवित प्राणी है और उसमें भी जीव के चार दोष होते हैं। राजा इंद्र को यहाँ भगवान के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका उपयोग आम तौर पर भगवान के परम व्यक्तित्व के लिए किया जाता है। हालाँकि, इस मामले में, राजा इंद्र को भगवान के रूप में सम्बोधित किया गया है क्योंकि उसके हाथों में बहुत अधिक शक्ति है। भगवान बनने के बाद भी, वह ईश्वर के अवतार, पृथु महाराजा से ईर्ष्या करता है। भौतिक जीवन के दोष इतने प्रबल हैं कि उसके दोष के कारण राजा इंद्र भगवान के अवतार से ईर्ष्या करता है। हमें यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि एक जीव कैसे पतनशील बन जाता है। पृथु राजा का वैभव भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर नहीं था। जैसा कि इस श्लोक में वर्णित है, वे अधोक्षज के महान भक्त थे। अधोक्षज शब्द भगवान के व्यक्तित्व का संकेत देता है, जो मन और शब्दों की अभिव्यक्ति से परे है। हालाँकि, भगवान के परम व्यक्तित्व भक्त के सामने अपने अनादि आनंद और ज्ञान के मूल रूप में प्रकट होते हैं। भक्त को भगवान को आमने-सामने देखने की अनुमति है, यद्यपि भगवान हमारी इंद्रियों की अभिव्यक्ति से परे हैं और हमारी प्रत्यक्ष धारणा से परे हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)