इस श्लोक में असद्भिः और अधृतव्रतिः शब्द महत्वपूर्ण हैं। असद्भिः शब्द से तात्पर्य गैर-भक्तों से है। गैर-भक्तों को भगवद-गीता में दुष्कृतः (दुष्ट), मूढ़ः (गधे या बदमाश), नराधमः (मानव जाति में सबसे कम) और मायापहृत-ज्ञानः (जिन्होंने भ्रामक शक्ति की शक्ति के लिए अपना ज्ञान खो दिया है) के रूप में वर्णित किया गया है। ) ये सभी व्यक्ति असत, गैर-भक्त हैं। गैर-भक्तों को गृह-व्रत भी कहा जाता है, जबकि भक्त को धृत-व्रत कहा जाता है। संपूर्ण वैदिक योजना यह है कि गुमराह की गई सशर्त आत्माएं जो भौतिक प्रकृति पर प्रभुता पाने के लिए आई हैं, उन्हें धृत-व्रत बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इसका मतलब यह है कि उन्हें केवल सर्वोच्च भगवान की इंद्रियों को संतुष्ट करके अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने या भौतिक जीवन का आनंद लेने की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। सर्वोच्च भगवान कृष्ण की इंद्रियों को संतुष्ट करने के लिए गतिविधियाँ कृष्णार्थ'खिला-चेष्टाः कहलाती हैं। यह इंगित करता है कि व्यक्ति सभी प्रकार के काम करने का प्रयास कर सकता है, लेकिन उसे ऐसा कृष्ण को संतुष्ट करने के लिए करना चाहिए। इसे भगवद-गीता में यज्ञार्थ कर्म के रूप में वर्णित किया गया है। यज्ञ शब्द भगवान विष्णु को इंगित करता है। हमें सिर्फ उनकी संतुष्टि के लिए ही काम करना चाहिए। हालाँकि, आधुनिक समय (कलियुग) में, लोग विष्णु को पूरी तरह से भूल गए हैं, और वे अपनी गतिविधियों को संवेदनात्मक संतुष्टि के लिए संचालित करते हैं। ऐसे लोग धीरे-धीरे गरीबी से त्रस्त हो जाएंगे, क्योंकि वे उन चीजों का उपयोग नहीं कर सकते जो सर्वोच्च भगवान द्वारा स्वयं के लिए आनंद लेने के लिए हैं। यदि वे इस तरह जारी रखते हैं, तो अंततः गरीबी की स्थिति होगी, और कोई अनाज, फल या फूल नहीं निकलेगा। वास्तव में, भागवतम् के बारहवें कांड में कहा गया है कि कलियुग के अंत में लोग इतने प्रदूषित हो जाएंगे कि अब कोई अनाज, गेहूं, गन्ना या दूध नहीं रहेगा।
