राजा पृथु के राज सिंहासन पर बैठने से पहले अलग-अलग नगरों, गाँवों, चराई स्थल इत्यादि के लिए कोई सुव्यवस्थित योजना नहीं थी। सब कुछ अस्त-व्यस्त था और प्रत्येक व्यक्ति अपनी सुविधानुसार अपना घर बनाता था। लेकिन, राजा पृथु के समय से नगरों और गाँवों की योजनाएँ बनने लगीं।
Before the rule of King Prithu, there was no well-planned arrangement of various cities, villages, pastures etc. Everything was scattered and every person used to make his residence according to his convenience. But from the time of King Prithu, plans of cities and villages started being made.
तात्पर्य
इस कथन से यह प्रतीत होता है कि नगर एवं शहर की योजना एक नई चीज नहीं है बल्कि राजा पृथु के काल से चली आ रही है। भारत में तो अति प्राचीन कालों में बसी हुई नगरियों में नियमित नियोजन के तरीके देखे जा सकते हैं। श्रीमद् भागवतम में ऐसी अनेक प्राचीन नगरियों का वर्णन है। पाँच हज़ार वर्ष पूर्व भी भगवान श्रीकृष्ण की राजधानी द्वारका समुचित रूप से नियोजित थी। इसी प्रकार की अन्य नगरियाँ- मथुरा और हस्तिनापुर (अब नई दिल्ली) भी समुचित रूप से नियोजित थीं। इस प्रकार नगर और शहरों का नियोजन आधुनिक काल का आविष्कार नहीं है, अपितु अति प्राचीन काल में भी किया गया था।
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध चार के अंतर्गत अठारहवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥