श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 18: पृथु महाराज द्वारा पृथ्वी का दोहन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  4.18.3 
अस्मिँल्लोकेऽथवामुष्मिन्मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभि: ।
द‍ृष्टा योगा: प्रयुक्ताश्च पुंसां श्रेय:प्रसिद्धये ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
समाज को न केवल इस जीवन में बल्कि आने वाले जन्म में भी लाभ पहुँचाने के लिए महान ऋषियों और संतों ने जनता की समृद्धि के लिए कई तरह के अनुकूल तरीके सुझाए हैं।
 
To benefit human society not only in this life but also in the next life, great sages and saints have recommended various methods conducive to the prosperity of the people.
तात्पर्य
वैदिक सभ्यता वेदों में प्रस्तुत उत्तम ज्ञान का लाभ उठाती है और जो महान संतों और ब्राह्मणों द्वारा मानव समाज के लाभ के लिए प्रस्तुत किया गया है। वैदिक आज्ञाओं को श्रुति के रूप में जाना जाता है, और महान संतों द्वारा दिए गए इन सिद्धांतों की अतिरिक्त पूरक प्रस्तुतियों को स्मृति के रूप में जाना जाता है। वे वैदिक निर्देशों के सिद्धांतों का पालन करते हैं। मानव समाज को श्रुति और स्मृति दोनों से निर्देशों का लाभ उठाना चाहिए। यदि कोई आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करना चाहता है, तो उसे इन निर्देशों को लेना चाहिए और सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। भक्ति-रसामृत-सिंधु में, श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि अगर कोई खुद को आध्यात्मिक जीवन में उन्नत होने का दिखाता है लेकिन श्रुति और स्मृतियों का हवाला नहीं देता है तो वह समाज में केवल एक उपद्रव है। किसी को न केवल अपने आध्यात्मिक जीवन में बल्कि भौतिक जीवन में भी श्रुति और स्मृतियों में निर्धारित सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। जहां तक मानव समाज का संबंध है, उसे मनु-स्मृति का भी पालन करना चाहिए, क्योंकि ये कानून मानवता के जनक मनु द्वारा दिए गए हैं। मनु-स्मृति में कहा गया है कि एक स्त्री को स्वतंत्रता नहीं दी जानी चाहिए, बल्कि उसे उसके पिता, पति और वृद्ध पुत्रों द्वारा संरक्षण दिया जाना चाहिए। सभी परिस्थितियों में एक स्त्री को किसी संरक्षक पर निर्भर रहना चाहिए। वर्तमान में महिलाओं को पुरुषों की तरह पूर्ण स्वतंत्रता दी जाती है, लेकिन वास्तव में हम देख सकते हैं कि ऐसी स्वतंत्र महिलाएं उन महिलाओं से ज्यादा खुश नहीं हैं जो संरक्षकों के अधीन हैं। यदि लोग महान संतों, श्रुति और स्मृतियों द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करते हैं, तो वे वास्तव में इस जीवन और अगले दोनों में खुश रह सकते हैं। दुर्भाग्य से, बदमाश खुश रहने के लिए बहुत सारे तरीके और साधन बना रहे हैं। हर कोई बहुत सारे तरीके बना रहा है। नतीजतन, मानव समाज ने भौतिक और आध्यात्मिक दोनों तरह से जीवन के मानक तरीकों को खो दिया है, और इसके परिणामस्वरूप लोग भ्रमित हो गए हैं और दुनिया में कोई शांति या खुशी नहीं है। यद्यपि वे संयुक्त राष्ट्र में मानव समाज की समस्याओं को हल करने का प्रयास कर रहे हैं, फिर भी वे अभी भी चकित हैं। क्योंकि वे वेदों के मुक्त निर्देशों का पालन नहीं करते हैं, वे दुखी हैं। इस श्लोक में प्रयोग किए गए दो महत्वपूर्ण शब्द हैं असमिन और अमुष्मिन। असमिन का अर्थ है "इस जीवन में", और अमुष्मिन का अर्थ है "अगले जीवन में"। दुर्भाग्य से, इस युग में उन्नत प्रोफेसर और विद्वान भी मानते हैं कि कोई अगला जीवन नहीं है और सब कुछ इस जीवन में समाप्त हो जाता है। चूँकि वे बदमाश और मूर्ख हैं, तो वे क्या सलाह दे सकते हैं? फिर भी वे विद्वान विद्वानों और प्रोफेसरों के रूप में पास हो रहे हैं। इस श्लोक में अमुष्मिन शब्द बहुत स्पष्ट है। प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन को इस तरह से ढाले कि उसका अगला जीवन लाभदायक हो। जैसे एक लड़के को बाद में खुश रहने के लिए शिक्षित किया जाता है, उसी तरह इस जीवन में मृत्यु के बाद शाश्वत और समृद्ध जीवन प्राप्त करने के लिए शिक्षित होना चाहिए। इसलिए यह आवश्यक है कि लोग मानव मिशन को सफल बनाने के लिए श्रुति और स्मृतियों में जो दिया गया है उसका पालन करें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)