श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 18: पृथु महाराज द्वारा पृथ्वी का दोहन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  4.18.22 
तथाहयो दन्दशूका: सर्पा नागाश्च तक्षकम् ।
विधाय वत्सं दुदुहुर्बिलपात्रे विषं पय: ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् बिना फनवाले और फनवाले साँपों, बड़े साँपों, बिच्छुओं और अन्य जहरीले पशुओं ने पृथ्वी के दूध के समान अपने विष को दुहकर सांप के बिलों में रख लिया। उन्होंने तक्षक को बछड़ा बनाया हुआ था।
 
Thereafter, the hooded and hoodless snakes, serpents, scorpions and other poisonous animals milked their poison in the form of milk from the earth and placed this poison in the snake holes. They had turned Takshak into a calf.
तात्पर्य
इस भौतिक जगत में अनेक प्रकार की जीवित इकाइयाँ हैं और इस श्लोक में वर्णित विभिन्न प्रकार के सरीसृप और बिच्छुओं को भी भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की व्यवस्था के द्वारा अपना भरण-पोषण किया जाता है। मुद्दा यह है कि हर कोई ग्रह पृथ्वी से अपनी खाने की चीजें ले रहा है। भौतिक गुणों के साथ अपने संबंध के अनुसार, एक व्यक्ति एक निश्चित प्रकार का चरित्र विकसित करता है। पयः-पाणम् भुजङ्गानम्: यदि कोई साँप को दूध पिलाता है, तो साँप बस अपने जहर को बढ़ाएगा। हालाँकि, यदि कोई प्रतिभाशाली ऋषि या संत को दूध देता है, तो ऋषि महीन मस्तिष्क के ऊतकों का विकास करेगा जिससे वह उच्च, आध्यात्मिक जीवन पर विचार कर सकता है। इस प्रकार भगवान हर किसी को भोजन प्रदान कर रहे हैं, लेकिन भौतिक प्रकृति के तरीकों के साथ जीवित इकाई के संबंध के अनुसार, जीवित इकाई अपने विशिष्ट चरित्र को विकसित करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)