ईश्वराणाम शब्द भगवान के सभी व्यक्तिगत रूपों को संदर्भित करता है। जैसा कि ब्रह्म-संहिता (5.39) में कहा गया है, रामादि-मूर्तिषु कला-नियमेन तिष्ठान। श्रीमद-भागवतम में यह पुष्टि की गई है कि सभी अवतार भगवान के आंशिक विस्तार, या कला हैं। हालाँकि, कृष्ण भगवान के मूल परम व्यक्तित्व हैं। व्यक्ति को ईश्वराणाम शब्द की बहुवचन संख्या को यह अर्थ नहीं लेना चाहिए कि कई देवता हैं। तथ्य यह है कि ईश्वर एक है, लेकिन वह सनातन रूप से विद्यमान है और असंख्य रूपों में खुद का विस्तार करता है और विभिन्न तरीकों से कार्य करता है। कभी-कभी आम आदमी इससे घबरा जाता है और ऐसी गतिविधियों को विरोधाभासी मानता है, लेकिन वे विरोधाभासी नहीं हैं। भगवान की सभी गतिविधियों के पीछे एक महान योजना है।
हमारी समझ के लिए कभी-कभी यह कहा जाता है कि भगवान चोर के हृदय में और साथ ही गृहस्थ के हृदय में स्थित हैं, और चोर के हृदय में स्थित परमात्मा यह निर्देश देता है, "जाओ और उस विशेष घर से चीजें चुराओ," और एक ही समय में भगवान गृहस्थ से कहते हैं, "अब चोरों और चोरों से सावधान रहें।" विभिन्न व्यक्तियों को दिए गए ये निर्देश विरोधाभासी प्रतीत होते हैं, फिर भी हमें पता होना चाहिए कि परमात्मा, भगवान के परम व्यक्तित्व की कुछ योजना है, और हमें ऐसी गतिविधियों को विरोधाभासी नहीं मानना चाहिए। सर्वोत्तम उपाय यह है कि भगवान के परम व्यक्तित्व के प्रति पूरे दिल से समर्पण कर दें और उनकी रक्षा में रहकर शांत रहें।
