श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 17: महाराज पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  4.17.36 
नूनं जनैरीहितमीश्वराणा-
मस्मद्विधैस्तद्गुणसर्गमायया ।
न ज्ञायते मोहितचित्तवर्त्मभि-
स्तेभ्यो नमो वीरयशस्करेभ्य: ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, मैं भी आपकी त्रिगुणात्मक शक्ति से उत्पन्न हुआ हूँ। इसलिए मैं आपकी गतिविधियों से चकराया हुआ हूँ। जब आपके भक्तों के कामकाज को समझना ही मुश्किल है, तो आपकी लीलाओं के बारे में क्या कहा जा सकता है? इस तरह, हर चीज हमें विरोधाभासी और अद्भुत लगती है।
 
O Lord, I too am born of Your triguna sakti, and as a result I am bewildered by Your activities. When the activities of Your devotees are beyond understanding, what can be said about Your pastimes? Thus everything appears contradictory and astonishing to us.
तात्पर्य
भगवान के विभिन्न रूपों और अवतारों में उनकी गतिविधियाँ हमेशा असामान्य और अद्भुत होती हैं। किसी छोटे से इंसान के लिए ऐसी गतिविधियों के उद्देश्य और योजनाओं का अनुमान लगाना संभव नहीं है; इसलिए श्रील जीव गोस्वामी ने कहा है कि जब तक भगवान की गतिविधियों को अकल्पनीय नहीं माना जाता तब तक उन्हें समझाया नहीं जा सकता। भगवान गोलोक वृंदावन में कृष्ण, भगवान के रूप में सनातन रूप से विद्यमान हैं। उन्होंने एक साथ भगवान राम, भगवान नृसिंह, भगवान वराह से शुरू होकर और संकर्षण से सीधे आने वाले सभी अवतारों के साथ असंख्य रूपों में अपना विस्तार किया है। संकर्षण बलदेव का विस्तार है और बलदेव कृष्ण की पहली अभिव्यक्ति है। इसलिए इन सभी अवतारों को कला के रूप में जाना जाता है।

ईश्वराणाम शब्द भगवान के सभी व्यक्तिगत रूपों को संदर्भित करता है। जैसा कि ब्रह्म-संहिता (5.39) में कहा गया है, रामादि-मूर्तिषु कला-नियमेन तिष्ठान। श्रीमद-भागवतम में यह पुष्टि की गई है कि सभी अवतार भगवान के आंशिक विस्तार, या कला हैं। हालाँकि, कृष्ण भगवान के मूल परम व्यक्तित्व हैं। व्यक्ति को ईश्वराणाम शब्द की बहुवचन संख्या को यह अर्थ नहीं लेना चाहिए कि कई देवता हैं। तथ्य यह है कि ईश्वर एक है, लेकिन वह सनातन रूप से विद्यमान है और असंख्य रूपों में खुद का विस्तार करता है और विभिन्न तरीकों से कार्य करता है। कभी-कभी आम आदमी इससे घबरा जाता है और ऐसी गतिविधियों को विरोधाभासी मानता है, लेकिन वे विरोधाभासी नहीं हैं। भगवान की सभी गतिविधियों के पीछे एक महान योजना है।

हमारी समझ के लिए कभी-कभी यह कहा जाता है कि भगवान चोर के हृदय में और साथ ही गृहस्थ के हृदय में स्थित हैं, और चोर के हृदय में स्थित परमात्मा यह निर्देश देता है, "जाओ और उस विशेष घर से चीजें चुराओ," और एक ही समय में भगवान गृहस्थ से कहते हैं, "अब चोरों और चोरों से सावधान रहें।" विभिन्न व्यक्तियों को दिए गए ये निर्देश विरोधाभासी प्रतीत होते हैं, फिर भी हमें पता होना चाहिए कि परमात्मा, भगवान के परम व्यक्तित्व की कुछ योजना है, और हमें ऐसी गतिविधियों को विरोधाभासी नहीं मानना चाहिए। सर्वोत्तम उपाय यह है कि भगवान के परम व्यक्तित्व के प्रति पूरे दिल से समर्पण कर दें और उनकी रक्षा में रहकर शांत रहें।

 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध चार के अंतर्गत सत्रहवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)