श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 17: महाराज पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.17.33 
सर्गादि योऽस्यानुरुणद्धि शक्तिभि-
र्द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मभि: ।
तस्मै समुन्नद्धनिरुद्धशक्तये
नम: परस्मै पुरुषाय वेधसे ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
हे भगवान, अपनी स्वयं की शक्तियों द्वारा, आप भौतिक तत्वों, काम करने वाले उपकरणों (इंद्रियां), इंद्रियों के कार्यकर्ता (नियंत्रित करने वाले देवता), बुद्धि और अहंकार, और सब कुछ के मूल कारण हैं। अपनी ऊर्जा से आप इस संपूर्ण ब्रह्मांडीय निर्माण को प्रकट करते हैं, इसे बनाए रखते हैं और इसे विघटित करते हैं। केवल आपकी ऊर्जा के माध्यम से ही सब कुछ कभी प्रकट होता है और कभी प्रकट नहीं होता। इसलिए आप सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं, सभी कारणों का कारण। मैं आपको अपना सम्मानपूर्वक प्रणाम अर्पित करती हूं।
 
O Lord, by Your energies You are the root cause of the material elements, the senses, their controlling deities, the intellect, the ego and everything else. By Your energies You create, maintain and destroy this entire cosmic manifestation. By Your energies everything sometimes appears and sometimes does not appear. Therefore You are the cause of all causes, the Supreme Personality of Godhead. I offer my respectful obeisances unto You.
तात्पर्य
सभी गतिविधियाँ सम्पूर्ण ऊर्जा, महात-तत्व की सृष्टि से प्रारम्भ होती हैं। फिर, तीन गुणों के आन्दोलन से, भौतिक तत्वों का निर्माण होता है, साथ ही मन, अहंकार और इन्द्रियों के नियंत्रक भी निर्मित होते हैं। यह सभी एक के बाद एक भगवान की अतुलनीय ऊर्जा से निर्मित होते हैं। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स में, एक मैकेनिक केवल एक बटन दबाकर एक इलेक्ट्रॉनिक चेन रिएक्शन को शुरू कर सकता है, जिसके द्वारा कई क्रियाएँ एक के बाद एक सम्पन्न होती हैं। ठीक इसी प्रकार, परमेश्वर व्यक्तित्व ईश्वर सृष्टि का बटन दबाते हैं, और विभिन्न ऊर्जाएँ भौतिक तत्वों और भौतिक तत्वों के विभिन्न नियंत्रकों का निर्माण करती हैं, और उनकी परिणामी अन्योन्य क्रियाएँ परमेश्वर व्यक्तित्व ईश्वर की अतुलनीय योजना का अनुसरण करती हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)