य एतदादावसृजच्चराचरं
स्वमाययात्माश्रययावितर्क्यया ।
तयैव सोऽयं किल गोप्तुमुद्यत:
कथं नु मां धर्मपरो जिघांसति ॥ ३१ ॥
अनुवाद
सृष्टि के आरंभ में आपने अपनी अकल्पनीय शक्ति के द्वारा सभी चल और अचल जीवों को जन्म दिया। अब आप उसी शक्ति से जीवों की रक्षा करने के लिए उद्यत हैं। आप धर्म के नियमों के परम रक्षक हैं। मैं गौरूप में हूं, तो आप मुझे मारने के लिए इतने उत्सुक क्यों हैं?
In the beginning of creation, you created all these living and non-living beings with your unimaginable power. Now you are ready to protect the living beings with the same power. You are the ultimate protector of the rules of Dharma. Why are you so eager to kill me, a cow?
तात्पर्य
धरती तर्क देती है कि इसमें कोई शक नहीं कि जिसने बनाया है वह अपनी इच्छा से नष्ट भी कर सकता है। धरती सवाल करती है कि जब प्रभु सबकी रक्षा के लिए तैयार है, तो उसे क्यों मारा जाए। आख़िर यही धरती है जो सभी जीवों के लिए विश्राम स्थल है और यही धरती है जो उनके लिए अनाज पैदा करती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥