श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 17: महाराज पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  4.17.30 
येनाहमात्मायतनं विनिर्मिता
धात्रा यतोऽयं गुणसर्गसङ्ग्रह: ।
स एव मां हन्तुमुदायुध: स्वरा-
डुपस्थितोऽन्यं शरणं कमाश्रये ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वी ने आगे कहा: हे भगवान, आप संपूर्ण भौतिक जगत के संचालक हैं। आपने ब्रह्मांड के साथ-साथ तीनों गुणों की रचना की है। और इसलिए आपने मुझे बनाया, पृथ्वी। मैं वह ग्रह हूँ जो सभी जीवों का आश्रयस्थल है। हे भगवान, आप पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं। अब जब आप मेरे सामने खड़े हैं और मुझे अपने हथियारों से मारने के लिए तैयार हैं, तो मुझे बताएँ कि मुझे शरण कहाँ मिलेगी और कौन मुझे सुरक्षा दे सकता है?
 
The earth continued: O Lord, you are the absolute director of the material creation. You have created this cosmic manifestation and the three modes of action, and hence you have created me, the earth, who is the shelter of all living entities. Yet, O Lord, you are supremely independent. Now that you are present before me and ready to kill me with your weapons, please tell me in whom should I seek shelter and who can shelter me?
तात्पर्य
यहाँ ग्रह पृथ्वी प्रभु के समक्ष पूर्ण समर्पण के लक्षण प्रदर्शित करता है। जैसा कि कहा गया है, कोई भी उस व्यक्ति की रक्षा नहीं कर सकता जिसे कृष्ण मारने के लिए तैयार हैं, और कोई भी उस व्यक्ति को नहीं मार सकता जिसे कृष्ण सुरक्षित रखते हैं। क्योंकि प्रभु ग्रह पृथ्वी को मारने के लिए तैयार थे, इसलिए उसे सुरक्षा देने वाला कोई नहीं था। हम सभी को प्रभु से सुरक्षा प्राप्त हो रही है, और इसलिए यह उचित है कि हम सब उनको आत्मसमर्पण कर दें। भगवद्-गीता (18.66) में प्रभु निर्देश देते हैं:

सर्व-धर्मान्‌ परित्यज्य

माम्‌ एकं शरणं व्रज

अहं त्वां सर्व-पापेभ्यो

मोक्षयिष्यामि मा शुचः

''सभी प्रकार के धर्मों का त्याग करो और सिर्फ़ मुझको ही अपना आश्रय बनाओ। मैं तुम्हें सभी पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त कर दूँगा। डरो मत।''

श्रील भक्तिविनोद ठाकुर गाते हैं, ''मेरे प्रिय प्रभु, मेरे पास जो कुछ भी है - मेरे मन, सभी भौतिक आवश्यकताओं का केंद्र, अर्थात् मेरा घर, मेरा शरीर और इस शरीर से जुड़ी जो कुछ भी है - मैं अब आपके समक्ष समर्पण करता हूँ। अब आप पूरी तरह से स्वतंत्र हैं कि आप जो चाहें वह कर सकते हैं। यदि आप चाहें, तो आप मुझे मार सकते हैं, और यदि आप चाहें, तो आप मुझे बचा सकते हैं। किसी भी मामले में, मैं आपका शाश्वत सेवक हूँ, और आपको जो चाहें वह करने का पूरा अधिकार है।''

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)