श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 17: महाराज पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  4.17.29 
धरोवाच
नम: परस्मै पुरुषाय मायया
विन्यस्तनानातनवे गुणात्मने ।
नम: स्वरूपानुभवेन निर्धुत
द्रव्यक्रियाकारकविभ्रमोर्मये ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
ग्रह पृथ्वी ने कहा: हे भगवान, आपकी स्थिति दिव्य है और आपने अपनी शक्ति के द्वारा तीनों गुणों की अन्योन्य क्रिया से अपने आप को विभिन्न रूपों और प्रजातियों में विस्तारित कर रखा है। अन्य स्वामियों से अलग आप हमेशा अपनी दिव्य स्थिति में रहते हैं और भौतिक सृष्टि से प्रभावित नहीं होते हैं, जो विभिन्न भौतिक अन्योन्य क्रियाओं के अधीन है। परिणामस्वरूप, आप भौतिक गतिविधियों से मोहित नहीं होते हैं।
 
The Earth said: O Lord, Your state is transcendental and You have by Your Maya expanded Yourself into various forms and incarnations by the interaction of the three gunas. Unlike some other Swamis, You are always in the transcendental state and are not affected by the material creation which is affected by various material interactions. As a result, You are not bewildered by material actions.
तात्पर्य
राजा पृथु द्वारा अपना शाही आदेश दिए जाने के बाद, गाय के आकार में पृथ्वी यह समझ सकी कि राजा भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का प्रत्यक्ष रूप से सशक्त अवतार था। नतीजतन, राजा सब कुछ जानता था - अतीत, वर्तमान और भविष्य। इस प्रकार पृथ्वी द्वारा उसे धोखा देने की कोई संभावना नहीं थी। पृथ्वी पर सभी जड़ी-बूटियों और अनाजों के बीजों को छुपाने का आरोप लगाया गया था और इसलिए वह यह बताने की तैयारी कर रही है कि इन जड़ी-बूटियों और अनाजों के बीजों को फिर से कैसे उजागर किया जा सकता है। पृथ्वी जानती थी कि राजा उससे बहुत क्रोधित है, और उसे एहसास हुआ कि जब तक वह उसका क्रोध शांत नहीं करेगी, उसके सामने कोई सकारात्मक कार्यक्रम रखने की कोई संभावना नहीं थी। इसलिए अपने भाषण की शुरुआत में वह बहुत विनम्रता से स्वयं को भगवान के शरीर के एक अभिन्न अंग के रूप में प्रस्तुत करती है। उनका मानना ​​है कि भौतिक संसार में प्रकट होने वाले विभिन्न शारीरिक रूप सर्वोच्च विशाल शरीर के विभिन्न अंग हैं। ऐसा कहा जाता है कि निचले ग्रह भगवान के पैरों के हिस्से हैं, जबकि ऊपरी ग्रह भगवान के सिर के हिस्से हैं। भगवान इस भौतिक संसार को अपनी बाह्य ऊर्जा से बनाते हैं, लेकिन यह बाह्य ऊर्जा एक अर्थ में उनसे भिन्न नहीं है। फिर भी, भगवान सीधे तौर पर बाहरी ऊर्जा में प्रकट नहीं होते हैं बल्कि हमेशा आध्यात्मिक ऊर्जा में स्थित होते हैं। जैसा कि भगवद गीता (9.10) में कहा गया है, मायाध्यक्षेण प्रकृति:: भौतिक प्रकृति भगवान के निर्देशन में काम कर रही है। इसलिए भगवान बाहरी ऊर्जा से अनासक्त नहीं हैं, और उन्हें इस श्लोक में गुण-आत्मा, भौतिक प्रकृति के तीन गुणों का स्रोत, के रूप में संबोधित किया गया है। जैसा कि भगवद गीता (13.15) में कहा गया है, निर्गुणं गुण-भोक्त्र च: यद्यपि भगवान बाहरी ऊर्जा से जुड़े नहीं हैं, फिर भी वे इसके स्वामी हैं। भगवान चैतन्य का दर्शन, जो यह मानता है कि भगवान अपनी रचना (अचिन्त्य-भेदाभेद-तत्त्व) से एक साथ एक हैं और उससे भिन्न हैं, इस संबंध में बहुत आसानी से समझा जा सकता है। पृथ्वी ग्रह समझाता है कि यद्यपि भगवान बाहरी ऊर्जा से जुड़े हुए हैं, वे निर्धूत हैं; वह बाहरी ऊर्जा की गतिविधियों से पूरी तरह मुक्त है। भगवान सदैव अपनी आंतरिक ऊर्जा में स्थित रहते हैं। इसलिए इस श्लोक में कहा गया है: स्वरूप-अनुभावेन। भगवान पूरी तरह से अपनी आंतरिक शक्ति में रहते हैं और फिर भी उन्हें बाहरी ऊर्जा के साथ-साथ आंतरिक ऊर्जा का भी पूरा ज्ञान होता है, जैसे उनका भक्त हमेशा एक पारलौकिक स्थिति में रहता है, खुद को भौतिक शरीर से जुड़े बिना भगवान की सेवा में रखता है। . श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि जो भक्त हमेशा भगवान की भक्ति में लगा रहता है, वह हमेशा मुक्त होता है, चाहे उसकी भौतिक स्थिति कुछ भी हो। यदि एक भक्त के लिए दिव्य बने रहना संभव है, तो भगवान के लिए बाहरी शक्ति से जुड़े बिना अपनी आंतरिक शक्ति में बने रहना निश्चित रूप से संभव है। इस स्थिति को समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए. जैसे कोई भक्त अपने भौतिक शरीर से कभी भ्रमित नहीं होता, वैसे ही भगवान इस भौतिक जगत की बाहरी ऊर्जा से कभी भ्रमित नहीं होते। एक भक्त को भौतिक शरीर से कोई बाधा नहीं आती है, हालांकि वह भौतिक शरीर में स्थित होता है जो कई भौतिक स्थितियों के अनुसार चलता है। (उदाहरण के लिए, शरीर के भीतर पांच प्रकार की वायु कार्य करती है, और बहुत सारे अंग हैं - हाथ, पैर, जीभ, जननांग, मलाशय, आदि - सभी अलग-अलग तरीके से कार्य करते हैं।) आत्मा, जीवित इकाई, जो उसे अपनी स्थिति का पूरा ज्ञान है और वह हमेशा हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप करने में लगा रहता है और उसे शारीरिक कार्यों से कोई सरोकार नहीं है। यद्यपि भगवान भौतिक जगत से जुड़े हुए हैं, वे हमेशा अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा में स्थित रहते हैं और भौतिक जगत के कार्यों से हमेशा अनासक्त रहते हैं। जहां तक ​​भौतिक शरीर का संबंध है, छह "तरंगें" या रोगसूचक भौतिक स्थितियां हैं: भूख, प्यास, विलाप, घबराहट, बुढ़ापा और मृत्यु। मुक्त आत्मा को कभी भी इन छह भौतिक संबंधों से कोई सरोकार नहीं होता है। भगवान का परम व्यक्तित्व, सभी ऊर्जाओं का सर्वशक्तिमान स्वामी होने के नाते, बाहरी ऊर्जा के साथ कुछ संबंध रखता है, लेकिन वह भौतिक जगत में बाहरी ऊर्जा की बातचीत से हमेशा मुक्त रहता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)