एवं मन्युमयीं मूर्तिं कृतान्तमिव बिभ्रतम् ।
प्रणता प्राञ्जलि: प्राह मही सञ्जातवेपथु: ॥ २८ ॥
अनुवाद
इस समय पृथु महाराज बिल्कुल यमराज की तरह बन गए और उनका पूरा शरीर बहुत क्रोधित दिखाई देने लगा। दूसरे शब्दों में, वह क्रोध के मूर्त रूप थे। उन्हें सुनकर पृथ्वी कांपने लगी। उसने आत्मसमर्पण कर दिया और हाथ जोड़कर इस प्रकार कहने लगी।
At this time Prithu Maharaj became just like Yamaraja and his whole body appeared to be extremely angry. In other words, he appeared to be personified anger. Hearing his words, the earth began to tremble. It surrendered itself and folded its hands and said thus.
तात्पर्य
ईश्वर परम व्यक्तित्व कुकर्मियों के लिए मृत्यु के समान है और भक्तों के लिए परम प्रिय प्रभु है। भगवद्-गीता (10.34) में प्रभु कहते हैं, मृत्युः सर्व-हरश्चाऽहम: "मैं सर्वभक्षी मृत्यु हूँ।" विश्वासहीन अविश्वासी, जो ईश्वर के अवतार का विरोध करते हैं, उनका उद्धार भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व द्वारा किया जाएगा जब वह मृत्यु के रूप में उनके सामने प्रकट होंगे। उदाहरण के लिए, हिरण्यकश्यप ने भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व के अधिकार को चुनौती दी, और प्रभु ने नृसिंहदेव के रूप में उनसे मुलाकात की और उन्हें मार डाला। इसी तरह, पृथ्वी ग्रह ने महाराज पृथु को मृत्यु के समान देखा, और उसने उसे क्रोध के रूप में भी देखा। इसलिए वह कांपने लगी। कोई भी परिस्थिति में भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व के अधिकार को चुनौती नहीं दे सकता। उनको समर्पण करना और हर समय उनकी सुरक्षा लेना बेहतर है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥