श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 17: महाराज पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  4.17.22 
पृथुरुवाच
वसुधे त्वां वधिष्यामि मच्छासनपराङ्‍मुखीम् ।
भागं बर्हिषि या वृङ्क्ते न तनोति च नो वसु ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
राजा पृथु ने पृथ्वी से कहा: हे पृथ्वी, तूने मेरी आज्ञा और नियमों को नहीं माना। तूने हमारे द्वारा किए गए यज्ञों में देवता के रूप में अपना हिस्सा लिया, लेकिन बदले में पर्याप्त अनाज नहीं दिया। इसलिए मैं तुझे मार दूंगा।
 
King Prithu replied to the Earth: O Earth, you have violated my command and rules. You have taken your share as a deity in the sacrifices performed by us, but have not produced enough food in return. Therefore, I will kill you.
तात्पर्य
गाय के आकार वाली पृथ्वी ने अर्ज किया कि वह न केवल एक महिला है, बल्कि निर्दोष और पाप रहित भी है। इस प्रकार उसने तर्क दिया कि उसे नहीं मारा जाना चाहिए। इसके अलावा, उसने बताया कि पूर्ण रूप से धार्मिक विचारों वाले राजा धार्मिक सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं कर सकते जो एक महिला की हत्या को मना करते हैं। जवाब में, महाराजा पृथु ने उसे सूचित किया कि सबसे पहले उसने उसके आदेशों की अवहेलना की थी। यह उसकी पहली पापपूर्ण गतिविधि थी। दूसरे उसने उस पर यज्ञों (बलिदानों) का हिस्सा लेने का आरोप लगाया लेकिन बदले में पर्याप्त खाद्यान्न का उत्पादन नहीं किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)