श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 17: महाराज पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  4.17.18 
उवाच च महाभागं धर्मज्ञापन्नवत्सल ।
त्राहि मामपि भूतानां पालनेऽवस्थितो भवान् ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
धर्म के ज्ञाता व शरणागतों के आश्रय, परम ऐश्वर्यशाली राजा पृथु को सम्बोधित करते हुए उसने कहा - हे राजन्! आप समस्त जीवों के रक्षक हैं और वर्तमान में आप इस लोक के स्वामी हैं, अतः आप मुझे बचा लीजिए।
 
Addressing the most glorious King Prithu as the knower of Dharma and the refuge of those who seek refuge, he said, "Please save me. You are the protector of all living entities. Now you are enthroned as the king of this world."
तात्पर्य
गाय के आकार वाली पृथ्वी ने राजा पृथु को धर्मज्ञ के रूप में संबोधित किया, जिसका अर्थ है धर्म के सिद्धांतों को जानने वाला। धर्म के सिद्धांत बताते हैं कि एक महिला, एक गाय, एक बच्चा, एक ब्राह्मण और एक वृद्ध व्यक्ति को राजा या किसी और द्वारा सभी तरह की सुरक्षा दी जानी चाहिए। इसलिए माँ पृथ्वी ने गाय का रूप धारण किया। वह एक महिला भी थी। इस प्रकार उसने राजा से धर्म के सिद्धांतों को जानने वाले के रूप में अपील की। धार्मिक सिद्धांत यह भी बताते हैं कि अगर कोई आत्मसमर्पण कर दे तो उसे नहीं मारा जाना चाहिए। उसने राजा पृथु को याद दिलाया कि वह न केवल भगवान के अवतार थे, बल्कि पृथ्वी के राजा के रूप में भी स्थित थे। इसलिए उनका कर्तव्य था कि वे उसे माफ़ कर दें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)