श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 16: बन्दीजनों द्वारा राजा पृथु की स्तुति  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  4.16.3 
अथाप्युदारश्रवस: पृथोर्हरे:
कलावतारस्य कथामृताद‍ृता: ।
यथोपदेशं मुनिभि: प्रचोदिता:
श्लाघ्यानि कर्माणि वयं वितन्महि ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि हम आपकी महिमा का ठीक से गुणगान नहीं कर सकते, परन्तु आपके कार्यों की प्रशंसा करने में हमें दिव्य स्वाद आ रहा है। हम मुनियों और विद्वानों के निर्देशों के अनुसार आपकी महिमा का वर्णन करेंगे। हम जो कुछ भी कहते हैं, वह अपर्याप्त और बहुत नगण्य है। हे राजन, आप भगवान के प्रत्यक्ष अवतार हैं इसलिए आपके सभी कार्य उदार और सदैव प्रशंसनीय हैं।
 
यद्यपि हम आपकी महिमा का ठीक से गुणगान नहीं कर सकते, परन्तु आपके कार्यों की प्रशंसा करने में हमें दिव्य स्वाद आ रहा है। हम मुनियों और विद्वानों के निर्देशों के अनुसार आपकी महिमा का वर्णन करेंगे। हम जो कुछ भी कहते हैं, वह अपर्याप्त और बहुत नगण्य है। हे राजन, आप भगवान के प्रत्यक्ष अवतार हैं इसलिए आपके सभी कार्य उदार और सदैव प्रशंसनीय हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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