श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 16: बन्दीजनों द्वारा राजा पृथु की स्तुति  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  4.16.27 
दिशो विजित्याप्रतिरुद्धचक्र:स्वतेजसोत्पाटितलोकशल्य: ।
सुरासुरेन्द्रैरुपगीयमानमहानुभावो भविता पतिर्भुव: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
कोई भी पृथु महाराज के आदेशों का उल्लंघन करने में सक्षम नहीं होगा। पूरे संसार को जीतकर, वह नागरिकों के तीनों दुःखों को पूरी तरह से दूर कर देगा। तब उन्हें पूरे जगत में सम्मान प्राप्त होगा। उस समय सुर और असुर दोनों निस्संदेह उनकी उदार गतिविधियों का गुणगान करेंगे।
 
कोई भी पृथु महाराज के आदेशों का उल्लंघन करने में सक्षम नहीं होगा। पूरे संसार को जीतकर, वह नागरिकों के तीनों दुःखों को पूरी तरह से दूर कर देगा। तब उन्हें पूरे जगत में सम्मान प्राप्त होगा। उस समय सुर और असुर दोनों निस्संदेह उनकी उदार गतिविधियों का गुणगान करेंगे।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध चार के अंतर्गत सोलहवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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