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श्लोक 4.16.20  |
अयं भुवो मण्डलमोदयाद्रे-र्गोप्तैकवीरो नरदेवनाथ: ।
आस्थाय जैत्रं रथमात्तचाप:पर्यस्यते दक्षिणतो यथार्क: ॥ २० ॥ |
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| अनुवाद |
| यह राजा अनोखा पराक्रमी और वीर होगा जिसका कोई प्रतिद्वंद्वी ही नहीं होगा। धनुष धारण करके विजयी रथ पर वह सूर्य के समान भूमंडल की परिक्रमा करता हुआ दिखाई देगा, जो दक्षिण से अपनी कक्षा पर घूमता है। |
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| यह राजा अनोखा पराक्रमी और वीर होगा जिसका कोई प्रतिद्वंद्वी ही नहीं होगा। धनुष धारण करके विजयी रथ पर वह सूर्य के समान भूमंडल की परिक्रमा करता हुआ दिखाई देगा, जो दक्षिण से अपनी कक्षा पर घूमता है। |
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