श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 16: बन्दीजनों द्वारा राजा पृथु की स्तुति  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  4.16.19 
अयं तु साक्षाद्भगवांस्त्र्यधीश:कूटस्थ आत्मा कलयावतीर्ण: ।
यस्मिन्नविद्यारचितं निरर्थकंपश्यन्ति नानात्वमपि प्रतीतम् ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
यह राजा तीनों लोकों का स्वामी है और भगवान् ने इसे सीधे शक्ति दी है। यह अपरिवर्तनशील है और परमेश्वर का शक्त्यावेश अवतार है। मुक्त आत्मा और ज्ञानवान होने के कारण यह समस्त भौतिक विविधताओं को अर्थहीन मानता है क्योंकि उनका मूल आधार अविद्या है।
 
यह राजा तीनों लोकों का स्वामी है और भगवान् ने इसे सीधे शक्ति दी है। यह अपरिवर्तनशील है और परमेश्वर का शक्त्यावेश अवतार है। मुक्त आत्मा और ज्ञानवान होने के कारण यह समस्त भौतिक विविधताओं को अर्थहीन मानता है क्योंकि उनका मूल आधार अविद्या है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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