श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 16: बन्दीजनों द्वारा राजा पृथु की स्तुति  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.16.12 
अन्तर्बहिश्च भूतानां पश्यन् कर्माणि चारणै: ।
उदासीन इवाध्यक्षो वायुरात्मेव देहिनाम् ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
राजा पृथु अपने प्रत्येक नागरिक के अच्छे और बुरे कर्मों को देख पाएँगे। फिर भी उनकी गुप्तचर प्रणाली को कोई नहीं जान पाएगा और वे अपनी प्रशंसा या आलोचना से संबंधित मामलों में हमेशा तटस्थ रहेंगे। वे शरीर के भीतर स्थित हवा, अर्थात प्राण के समान होंगे, जो बाहर और अंदर से प्रकट होता है, लेकिन सभी कार्यों से सदैव अलग रहता है।
 
राजा पृथु अपने प्रत्येक नागरिक के अच्छे और बुरे कर्मों को देख पाएँगे। फिर भी उनकी गुप्तचर प्रणाली को कोई नहीं जान पाएगा और वे अपनी प्रशंसा या आलोचना से संबंधित मामलों में हमेशा तटस्थ रहेंगे। वे शरीर के भीतर स्थित हवा, अर्थात प्राण के समान होंगे, जो बाहर और अंदर से प्रकट होता है, लेकिन सभी कार्यों से सदैव अलग रहता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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