श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 15: राजा पृथु की उत्पत्ति और राज्याभिषेक  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  4.15.2 
तद् दृष्ट्वा मिथुनं जातमृषयो ब्रह्मवादिन: ।
ऊचु: परमसन्तुष्टा विदित्वा भगवत्कलाम् ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
ऋषिगण वैदिक ज्ञान में पारंगत थे। जब उन्होंने वेन की बाहों से एक स्त्री तथा पुरुष को उत्पन्न होते देखा, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे जान गये कि यह युगल भगवान विष्णु के पूर्णांश का विस्तार है, जो परमेश्वर है।
 
The sages were well versed in Vedic knowledge. When they saw a man and a woman emerging from Ven's arms, they became very happy because they realized that this couple was an expansion of the fullness of Lord Vishnu.
तात्पर्य
वैदिक ज्ञान के ज्ञाताओं महान ऋषियों और विद्वानों द्वारा अपनाई गई विधि पूर्ण थी। उन्होंने राजा वेन के पापपूर्ण कर्मों के सभी परिणामों को देखकर यह सुनिश्चित किया कि राजा वेन ने पहले बाहुक को जन्म दिया था, जैसा कि पिछले अध्याय में बताया गया था। इस प्रकार राजा वेन का शरीर शुद्ध होने के बाद, एक पुरुष और एक महिला उसमें से निकले, और महान ऋषि समझ सकते थे कि यह भगवान विष्णु का विस्तार था। यह विस्तार, निश्चित रूप से, विष्णु-तत्व नहीं था, बल्कि भगवान विष्णु के विशेष रूप से शक्तिशाली विस्तार को आविष्कार के रूप में जाना जाता था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)