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श्लोक 4.13.5  |
यास्ता देवर्षिणा तत्र वर्णिता भगवत्कथा: ।
मह्यं शुश्रूषवे ब्रह्मन् कार्त्स्न्येनाचष्टुमर्हसि ॥ ५ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे ब्राह्मण, नारद मुनि ने भगवान् का गुणगान कैसे किया और उस सभा में किन लीलाओं का वर्णन हुआ? मैं उन्हें सुनने का इच्छुक हूँ। कृपया भगवान् की उस महिमा का वर्णन विस्तार से कीजिये। |
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| हे ब्राह्मण, नारद मुनि ने भगवान् का गुणगान कैसे किया और उस सभा में किन लीलाओं का वर्णन हुआ? मैं उन्हें सुनने का इच्छुक हूँ। कृपया भगवान् की उस महिमा का वर्णन विस्तार से कीजिये। |
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