श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 13: ध्रुव महाराज के वंशजों का वर्णन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  4.13.28 
न विदामेह देवानां हेलनं वयमण्वपि ।
यन्न गृह्णन्ति भागान् स्वान् ये देवा: कर्मसाक्षिण: ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन, हमें ऐसा कोई कारण नज़र नहीं आता जिससे देवतागण अपने को किसी तरह से अपमानित या उपेक्षित समझ सकें, परंतु फिर भी यज्ञ के साक्षी देवता अपना भाग नहीं ग्रहण कर रहे हैं। यह बात हमारी समझ से परे है कि ऐसा क्यों हो रहा है?
 
हे राजन, हमें ऐसा कोई कारण नज़र नहीं आता जिससे देवतागण अपने को किसी तरह से अपमानित या उपेक्षित समझ सकें, परंतु फिर भी यज्ञ के साक्षी देवता अपना भाग नहीं ग्रहण कर रहे हैं। यह बात हमारी समझ से परे है कि ऐसा क्यों हो रहा है?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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