श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 13: ध्रुव महाराज के वंशजों का वर्णन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  4.13.22 
किं वांहो वेन उद्दिश्य ब्रह्मदण्डमयूयुजन् ।
दण्डव्रतधरे राज्ञि मुनयो धर्मकोविदा: ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
विदुर ने फिर प्रश्न किया कि उन महान धर्मात्मा ऋषियों ने, जो धार्मिक सिद्धांतों से पूर्ण रूप से अवगत थे, राजा वेन को, जो स्वयं दण्ड देने वाले दण्ड को धारण करने वाले थे, शाप क्यों देना चाहा और इस प्रकार उसे सबसे बड़ा दण्ड (ब्रह्मशाप) दे डाला?
 
विदुर ने फिर प्रश्न किया कि उन महान धर्मात्मा ऋषियों ने, जो धार्मिक सिद्धांतों से पूर्ण रूप से अवगत थे, राजा वेन को, जो स्वयं दण्ड देने वाले दण्ड को धारण करने वाले थे, शाप क्यों देना चाहा और इस प्रकार उसे सबसे बड़ा दण्ड (ब्रह्मशाप) दे डाला?
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas