श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  4.12.9 
तस्य प्रीतेन मनसा तां दत्त्वैडविडस्तत: ।
पश्यतोऽन्तर्दधे सोऽपि स्वपुरं प्रत्यपद्यत ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
इड़विडा के पुत्र, भगवान कुबेर, अत्यधिक प्रसन्न हुए, और खुशी-खुशी उन्होंने ध्रुव महाराज को उनका इच्छित वरदान प्रदान किया। इसके बाद, वे ध्रुव की दृष्टि से अंतर्धान हो गए, और ध्रुव महाराज अपनी राजधानी वापस चले गए।
 
Idavida's son Kubera was extremely pleased and happily gave the desired boon to Dhruva Maharaj. After that, seeing Dhruva, he disappeared and Dhruva Maharaj went back to his capital.
तात्पर्य
इडविडा के पुत्र के रूप में विख्यात कुबेर ध्रुव महाराज से अत्यधिक प्रसन्न हुए क्योंकि उन्होंने उनसे कोई भौतिक सुख नहीं मांगा। कुबेर देवताओं में से एक है, इसलिए कोई यह तर्क कर सकता है, "ध्रुव महाराज ने देवताओं के माध्यम से अभिशाप क्यों लिया?" उत्तर यह है कि वैष्णव के लिए देवता से अनुदान लेने में कोई आपत्ति नहीं है यदि वह कृष्ण-चेतना को आगे बढ़ाने के अनुकूल हो। उदाहरण के लिए, गोपी कात्यायनी की पूजा करते थे, जो कि एक देवी थी, लेकिन उन्हें देवी से केवल यही शुभकामना चाहिए थी कि कृष्ण उनके पति बने। एक विष्णु न तो किसी देवता से कोई शुभकामना मांगने में रुचि रखता है और न ही वह भगवान से किसी आशीर्वाद को प्राप्त करने में रुचि रखता है। भागवत में कहा गया है कि मुक्ति को सर्वोच्च व्यक्ति के द्वारा प्रदान किया जा सकता है, लेकिन यदि एक शुद्ध भक्त को भी सर्वोच्च ईश्वर द्वारा मुक्ति की पेशकश की जाती है, तो वह उसे स्वीकार करने से इनकार कर देता है। ध्रुव महाराज ने कुबेर से आध्यात्मिक दुनिया में स्थानांतरण के लिए नहीं कहा, जिसे मुक्ति कहा जाता है, उन्होंने केवल इतना ही मांगा कि वे जहाँ भी रहेंगे - चाहे आध्यात्मिक या भौतिक दुनिया में - वह हमेशा सर्वोच्च परमेश्वर को याद रखेंगे। एक वैष्णव हमेशा सभी के लिए सम्मानजनक होता है। इसलिए जब कुबेर ने उन्हें उन्हें आशीर्वाद देने की पेशकश की, तो उन्होंने उसे अस्वीकार नहीं किया। लेकिन वह कुछ ऐसा प्राप्त करना चाहते थे जो उनकी कृष्ण-चेतना में प्रगति के अनुकूल हो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)