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श्लोक 4.12.51  |
ज्ञानमज्ञाततत्त्वाय यो दद्यात्सत्पथेऽमृतम् ।
कृपालोर्दीननाथस्य देवास्तस्यानुगृह्णते ॥ ५१ ॥ |
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| अनुवाद |
| ध्रुव महाराज का जीवन वृत्तांत अमरता प्राप्त करने का सर्वोच्च ज्ञान है। जो लोग परम सत्य से परिचित नहीं हैं, उन्हें इस ज्ञान से सच्चाई के मार्ग का पता चल सकता है। जो लोग ईश्वरीय दयालुता के कारण गरीब जीवों के रखवाले बनने की जिम्मेदारी लेते हैं, उन्हें देवताओं का ध्यान और आशीर्वाद मिलता है। |
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| ध्रुव महाराज का जीवन वृत्तांत अमरता प्राप्त करने का सर्वोच्च ज्ञान है। जो लोग परम सत्य से परिचित नहीं हैं, उन्हें इस ज्ञान से सच्चाई के मार्ग का पता चल सकता है। जो लोग ईश्वरीय दयालुता के कारण गरीब जीवों के रखवाले बनने की जिम्मेदारी लेते हैं, उन्हें देवताओं का ध्यान और आशीर्वाद मिलता है। |
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