| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति » अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना » श्लोक 5 |
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| | | | श्लोक 4.12.5  | तद्गच्छ ध्रुव भद्रं ते भगवन्तमधोक्षजम् ।
सर्वभूतात्मभावेन सर्वभूतात्मविग्रहम् ॥ ५ ॥ | | | | | | अनुवाद | | प्रिय ध्रुव, आगे आओ। ईश्वर तुम्हारे कल्याण हेतु सदा अनुग्रह करें। भगवान, जो हमारी इन्द्रियों की विचार शक्ति से परे हैं, समस्त जीवात्माओं के परमात्मा हैं और इसलिए सभी जीवात्माएँ बिना भेदभाव के एक हैं। इसलिए भगवान के दिव्य रूप की सेवा आरम्भ करो, जो कि समस्त जीवों के परम आश्रय हैं। | | | | प्रिय ध्रुव, आगे आओ। ईश्वर तुम्हारे कल्याण हेतु सदा अनुग्रह करें। भगवान, जो हमारी इन्द्रियों की विचार शक्ति से परे हैं, समस्त जीवात्माओं के परमात्मा हैं और इसलिए सभी जीवात्माएँ बिना भेदभाव के एक हैं। इसलिए भगवान के दिव्य रूप की सेवा आरम्भ करो, जो कि समस्त जीवों के परम आश्रय हैं। | | ✨ ai-generated | | |
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