संत मैत्रेय जी ने सिफारिश की: दिन ढलने और सूरज उगने, दोनो काल में मनुष्य को अत्यंत ध्यानपूर्वक, ब्राह्मणों और अन्य द्विजों की संगति में बैठकर, ध्रुव महाराज का गुणगान और उनके कार्यों पर चर्चा करनी चाहिए।
The sage Maitreya recommended: One should sing the character and activities of Dhruva Maharaja very attentively in the morning and evening in the company of brahmanas or others.
तात्पर्य
यह कहा जाता है कि केवल भक्तों की संगति में ही परमेश्वर के व्यक्तित्व और उनके भक्तों के चरित्र और लीलाओं के महत्व को समझा जा सकता है। इस श्लोक में विशेष रूप से सिफ़ारिश की गई है कि ध्रुव महाराज के चरित्र पर दो बार जन्म लेने वालों के समाज में चर्चा की जानी चाहिए, जिसका उल्लेख योग्य ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को लेकर किया गया है। विशेष रूप से उन ब्राह्मणों के समाज की तलाश करनी चाहिए जो वैष्णवों की स्थिति तक पहुँच चुके हों। इस प्रकार श्रीमद-भागवतम की चर्चा, जिसमें भक्तों और प्रभु के चरित्र और लीलाओं का वर्णन है, बहुत जल्दी प्रभावी होती है। इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस को इसी उद्देश्य के लिए संगठित किया गया है। इस सोसायटी के हर केंद्र में - न केवल सुबह, शाम या दोपहर में, बल्कि व्यावहारिक रूप से चौबीस घंटे एक दिन - निरंतर भक्ति सेवा चल रही है। कोई भी व्यक्ति जो सोसायटी के संपर्क में आता है वह स्वचालित रूप से भक्त बन जाता है। हमारे पास वास्तविक अनुभव है कि कई कर्मवादी और अन्य लोग सोसायटी में आते हैं और ISKCON के मंदिरों में बहुत ही सुखद और शांतिपूर्ण वातावरण पाते हैं। इस श्लोक में द्वि-जन्मानम् शब्द का अर्थ है "दो बार जन्म लेने वाले"। कोई भी व्यक्ति इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस में शामिल हो सकता है और दो बार जन्म लेने के लिए दीक्षा ले सकता है। जैसा कि सनातन गोस्वामी द्वारा सिफारिश की गई है, दीक्षा और अधिकृत प्रशिक्षण की प्रक्रिया से कोई भी व्यक्ति दो बार जन्म ले सकता है। पहला जन्म माता-पिता द्वारा संभव होता है, और दूसरा जन्म आध्यात्मिक पिता और वैदिक ज्ञान द्वारा संभव होता है। जब तक कोई दो बार जन्म नहीं लेता तब तक वह प्रभु और उनके भक्तों के पारलौकिक गुणों को नहीं समझ सकता। इसलिए शूद्रों के लिए वेदों का अध्ययन वर्जित है। केवल शैक्षणिक योग्यताओं से एक शूद्र पारलौकिक विज्ञान को नहीं समझ सकता। वर्तमान समय में, पूरे विश्व में शूद्रों के उत्पादन के लिए ही शैक्षणिक प्रणाली तैयार की गयी है। एक बड़ा टेक्नोलॉजिस्ट भी बड़े शूद्र से ज़्यादा कुछ नहीं होता है। कलौ शूद्र-सम्भवः: कलि के युग में, हर कोई शूद्र है। क्योंकि दुनिया की पूरी आबादी में केवल शूद्र ही होते हैं, इसलिए आध्यात्मिक ज्ञान की गिरावट होती है, और लोग दुखी होते हैं। कृष्णा चेतना आंदोलन विशेष रूप से दुनिया भर में आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार करने के लिए योग्य ब्राह्मण बनाने के लिए शुरू किया गया है, इस प्रकार लोग बहुत खुश हो सकते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥