श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  4.12.44 
मैत्रेय उवाच
एतत्तेऽभिहितं सर्वं यत्पृष्टोऽहमिह त्वया ।
ध्रुवस्योद्दामयशसश्‍चरितं सम्मतं सताम् ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा: हे विदुर, तुमने मुझसे ध्रुव महाराज की अत्यधिक ख्याति और चरित्र के बारे में जो भी पूछा था, वह सब मैंने विस्तारपूर्वक बताया है। बड़े-बड़े साधु-संत और भक्त ध्रुव महाराज के बारे में सुनना पसंद करते हैं।
 
महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा: हे विदुर, तुमने मुझसे ध्रुव महाराज की अत्यधिक ख्याति और चरित्र के बारे में जो भी पूछा था, वह सब मैंने विस्तारपूर्वक बताया है। बड़े-बड़े साधु-संत और भक्त ध्रुव महाराज के बारे में सुनना पसंद करते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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