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श्लोक 4.12.41  |
नारद उवाच
नूनं सुनीते: पतिदेवताया-
स्तप:प्रभावस्य सुतस्य तां गतिम् ।
दृष्ट्वाभ्युपायानपि वेदवादिनो
नैवाधिगन्तुं प्रभवन्ति किं नृपा: ॥ ४१ ॥ |
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| अनुवाद |
| महर्षि नारद ने कहा: मात्र अपनी आत्मिक उन्नति और कड़े तप के प्रभाव से ही देवर्षि नारद ने कहा : मात्र अपनी आत्मिक उन्नति और कड़े तप के प्रभाव से ही पतिव्रता सुनीति के पुत्र ध्रुव महाराज ने वह उच्च पद प्राप्त किया है जिसे तथाकथित वेदांतियों के लिए भी पाना संभव नहीं, सामान्य मनुष्यों की तो बात ही क्या कही जाए। |
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| महर्षि नारद ने कहा: मात्र अपनी आत्मिक उन्नति और कड़े तप के प्रभाव से ही देवर्षि नारद ने कहा : मात्र अपनी आत्मिक उन्नति और कड़े तप के प्रभाव से ही पतिव्रता सुनीति के पुत्र ध्रुव महाराज ने वह उच्च पद प्राप्त किया है जिसे तथाकथित वेदांतियों के लिए भी पाना संभव नहीं, सामान्य मनुष्यों की तो बात ही क्या कही जाए। |
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