| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति » अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना » श्लोक 39 |
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| | | | श्लोक 4.12.39  | गम्भीरवेगोऽनिमिषं ज्योतिषां चक्रमाहितम् ।
यस्मिन् भ्रमति कौरव्य मेढ्यामिव गवां गण: ॥ ३९ ॥ | | | | | | अनुवाद | | सन्त मैत्रेय ने कहा: हे कुरुवंशी विदुर, जिस तरह बैल अपनी दाईं ओर बंधे मध्यवर्ती खंभे के चारों ओर चक्कर लगाते हैं, उसी तरह आकाश के सभी नक्षत्र बड़ी तेज़ी से ध्रुव महाराज के धाम का लगातार चक्कर लगाते रहते हैं। | | | | सन्त मैत्रेय ने कहा: हे कुरुवंशी विदुर, जिस तरह बैल अपनी दाईं ओर बंधे मध्यवर्ती खंभे के चारों ओर चक्कर लगाते हैं, उसी तरह आकाश के सभी नक्षत्र बड़ी तेज़ी से ध्रुव महाराज के धाम का लगातार चक्कर लगाते रहते हैं। | | ✨ ai-generated | | |
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