श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  4.12.34 
तत्र तत्र प्रशंसद्‌भि: पथि वैमानिकै: सुरै: ।
अवकीर्यमाणो दद‍ृशे कुसुमै: क्रमशो ग्रहान् ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
आकाश-मार्ग से यात्रा करते हुए ध्रुव महाराज ने क्रम से सौर मंडल के सभी ग्रहों को देखा और रास्ते में सभी देवताओं को उनके विमानों में बैठकर अपने उपर फूल बरसाते देखा।
 
आकाश-मार्ग से यात्रा करते हुए ध्रुव महाराज ने क्रम से सौर मंडल के सभी ग्रहों को देखा और रास्ते में सभी देवताओं को उनके विमानों में बैठकर अपने उपर फूल बरसाते देखा।
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas