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श्लोक 4.12.34  |
तत्र तत्र प्रशंसद्भि: पथि वैमानिकै: सुरै: ।
अवकीर्यमाणो ददृशे कुसुमै: क्रमशो ग्रहान् ॥ ३४ ॥ |
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| अनुवाद |
| आकाश-मार्ग से यात्रा करते हुए ध्रुव महाराज ने क्रम से सौर मंडल के सभी ग्रहों को देखा और रास्ते में सभी देवताओं को उनके विमानों में बैठकर अपने उपर फूल बरसाते देखा। |
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| आकाश-मार्ग से यात्रा करते हुए ध्रुव महाराज ने क्रम से सौर मंडल के सभी ग्रहों को देखा और रास्ते में सभी देवताओं को उनके विमानों में बैठकर अपने उपर फूल बरसाते देखा। |
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