श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  4.12.34 
तत्र तत्र प्रशंसद्‌भि: पथि वैमानिकै: सुरै: ।
अवकीर्यमाणो दद‍ृशे कुसुमै: क्रमशो ग्रहान् ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
आकाश-मार्ग से यात्रा करते हुए ध्रुव महाराज ने क्रम से सौर मंडल के सभी ग्रहों को देखा और रास्ते में सभी देवताओं को उनके विमानों में बैठकर अपने उपर फूल बरसाते देखा।
 
Dhruva Maharaja, while traveling through the sky, gradually saw all the planets of the solar system and on the way saw all the demigods showering flowers on him from their planes.
तात्पर्य
वैदिक वचन है, "यस्मिन् विज्ञाते सर्वम् एवम् विज्ञातं भवति," जिसका अर्थ है कि भगवान् के सर्वोच्च स्वरूप को जानने पर भक्त को सर्व कुछ ज्ञात हो जाता है। इसी प्रकार, भगवान् के सर्वोच्च व्यक्तित्व के लोकों में जाकर, कोई वैकुण्ठ के पथ में सभी अन्य लोकों को जान सकता है। हमें याद रखना चाहिए कि ध्रुव महाराज का शरीर हमारे शरीर से अलग था। वैकुण्ठ विमान में सवार होने पर, उनका शरीर पूर्णतः साधु के सुनहरे रंग में बदल गया। कोई भी भौतिक शरीर में ऊँचे लोकों से आगे नहीं निकल सकता है, लेकिन जब कोई आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करता है तो वह न केवल इस भौतिक संसार के ऊँचे लोकों में, बल्कि वैकुण्ठलोक के नाम से जाने जाने वाले उच्चतर लोकों में भी यात्रा कर सकता है। यह ज्ञात है कि नारद मुनि हर जगह, आध्यात्मिक और भौतिक दोनों लोकों में, यात्रा करते हैं। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि जब सुनीति वैकुण्ठलोक जा रही थीं, तो उन्होंने भी अपने शरीर को आध्यात्मिक रूप में बदल लिया। श्री सुनीति की तरह, प्रत्येक माँ को अपने बच्चे को ध्रुव महाराज की तरह एक भक्त बनने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए। सुनीति ने अपने बेटे को, पाँच साल की उम्र में ही, सांसारिक मामलों से अनासक्त रहने और सर्वोच्च भगवान् को खोजने के लिए जंगल में जाने का निर्देश दिया। उसने कभी यह इच्छा नहीं की कि उसका बेटा बिना किसी तपस्या और प्रायश्चित के भगवान् के सर्वोच्च व्यक्तित्व का अनुग्रह पाकर आराम से घर पर रहे। सुनीति की तरह, प्रत्येक माँ को अपने बेटे की देखभाल करनी चाहिए और उसे पाँच साल की उम्र से ही ब्रह्मचारी बनने और आध्यात्मिक साक्षात्कार के लिए तपस्या और प्रायश्चित करने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए। लाभ यह होगा कि यदि उसका बेटा ध्रुव की तरह एक दृढ़ भक्त बन जाता है, तो निश्चित रूप से न केवल उसका भगवान् के वापस घर स्थानांतरण होगा, बल्कि वह भी उसके साथ आध्यात्मिक संसार में स्थानांतरित हो जाएगी, भले ही वह भक्ति सेवा करने में तपस्या और प्रायश्चित करने में असमर्थ हो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)