वैकुण्ठलोक के महान् पार्षद नंद और सुनंद जी ध्रुव महाराज के मन की बात समझ गए। इसलिए उन्होंने उसे दिखाया कि उनकी माँ सुनीति दूसरे यान में आगे बढ़ रही है।
Nanda and Sunanda, the great ministers of Vaikuntha planet, understood Dhruva Maharaja's thoughts, and so they showed him that his mother Suniti was going ahead in another vehicle.
तात्पर्य
इस घटना से यह सिद्ध होता है कि जिस शिक्षा- या दीक्षा-गुरु के पास ध्रुव महाराज जैसे भक्तिभाव से अभिभूत शिष्य हों, वे शिष्य अपने गुरु को अपने साथ ले जा सकते हैं, भले ही गुरु उतना उन्नत न हों। हालाँकि, सुनीति ध्रुव महाराज की गुरु थीं, लेकिन वह जंगल में नहीं जा सकती थीं क्योंकि वह एक स्त्री थीं। न ही वह ध्रुव महाराज की तरह ही तपस्या और संयम का पालन कर सकती थीं। फिर भी, ध्रुव महाराज अपनी माँ को अपने साथ ले जाने में सक्षम थे। इसी तरह, प्रह्लाद महाराज ने भी अपने नास्तिक पिता, हिरण्यकश्यिप को मुक्त किया था। निष्कर्ष यह है कि जो शिष्य या संतान बहुत प्रबल भक्त हो, वह अपने पिता, माता या शिक्षा- या दीक्षा- गुरु को अपने साथ वैकुण्ठलोक ले जा सकता है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहा करते थे, "यदि मैं ईश्वर में वापस, घर में एक भी आत्मा को पूर्ण रूप से मुक्त करा सकूं, तो मैं अपने मिशन-कृष्ण चेतना के प्रचार को सफल मानूंगा।" कृष्ण चेतना आंदोलन अब पूरी दुनिया में फैल रहा है, और कभी-कभी मुझे लगता है कि यद्यपि मैं कई तरह से अपंग हूँ, यदि मेरा कोई शिष्य ध्रुव महाराज जितना प्रबल हो जाता है, तो वह मुझे अपने साथ वैकुण्ठलोक ले जाने में सक्षम होगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥