श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  4.12.32 
स च स्वर्लोकमारोक्ष्यन् सुनीतिं जननीं ध्रुव: ।
अन्वस्मरदगं हित्वा दीनां यास्ये त्रिविष्टपम् ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
जब ध्रुव महाराज उस दिव्य विमान में बैठने वाले थे, तभी उन्हें अपनी बेचारी माँ सुनीति की याद आ गई। वे ख़ुद से सोचने लगे, “अपनी बेचारी माँ को छोड़ कर मैं अकेला वैकुण्ठलोक कैसे जा सकता हूँ?”
 
जब ध्रुव महाराज उस दिव्य विमान में बैठने वाले थे, तभी उन्हें अपनी बेचारी माँ सुनीति की याद आ गई। वे ख़ुद से सोचने लगे, “अपनी बेचारी माँ को छोड़ कर मैं अकेला वैकुण्ठलोक कैसे जा सकता हूँ?”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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