मायावादी दार्शनिक कल्पना नहीं कर सकते कि यह एकता विभिन्न विविधताओं में भी कैसे प्राप्त की जा सकती है। एकता के बारे में उनका विचार यह है कि कोई विविधता नहीं है। इसलिए वे अवैयक्तिकतावादी बन गए हैं। जैसे शिशुमार, विष्णुलोक या ध्रुवलोक इस भौतिक दुनिया से पूरी तरह अलग हैं, वैसे ही इस दुनिया में एक विष्णु मंदिर भी इस भौतिक दुनिया से पूरी तरह से अलग है। जैसे ही हम मंदिर में होते हैं हमें यह अच्छी तरह से पता होना चाहिए कि हम भौतिक दुनिया से अलग स्थित हैं। मंदिर में, भगवान विष्णु, उनका सिंहासन, उनका कमरा और मंदिर से जुड़ी अन्य सभी चीजें पारलौकिक हैं। तीन तरीके - सत्व-गुण, रजो-गुण और तमो-गुण - मंदिर में प्रवेश नहीं करते हैं। इसलिए कहा जाता है कि जंगल में रहना अच्छे तरीके का है, शहर में रहना जुनून के तरीके का है, और वेश्यालय, शराब की दुकान या बूचड़खाने में रहना अज्ञानता के तरीके का है, लेकिन मंदिर में रहने का मतलब वैकुंठलोक में रहना है। मंदिर में सब कुछ भगवान विष्णु या कृष्ण की तरह पूजनीय है।
