श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  4.12.29 
परीत्याभ्यर्च्य धिष्ण्याग्र्यं पार्षदावभिवन्द्य च ।
इयेष तदधिष्ठातुं बिभ्रद्रूपं हिरण्मयम् ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
ध्रुव महाराज ने चढ़ने से पहले विमान की पूजा की, उसकी परिक्रमा की और विष्णु के साथियों को भी प्रणाम किया। इसी दौरान वे पिघले हुए सोने की तरह चमकने लगे और रोशन हो उठे। इस प्रकार वे उस दिव्य विमान में चढ़ने के लिए पूरी तरह से तैयार थे।
 
Before boarding, Dhruva Maharaja worshipped the aircraft, circumambulated it and also saluted the courtiers of Vishnu. During this time, he became as radiant and luminous as molten gold. Thus he was fully prepared to board that divine vehicle.
तात्पर्य
परम जगत में, विमान, भगवान विष्णु के साथी और स्वयं भगवान विष्णु सब आध्यात्मिक हैं -- कोई भौतिक दूषण नहीं है। गुणवत्ता में, सब कुछ एक है। जैसे भगवान विष्णु पूजनीय हैं, वैसे ही उनके साथी, उनका उपकरण, उनका हवाई जहाज और उनका निवास भी हैं, क्योंकि विष्णु की हर चीज़ भगवान विष्णु जितनी ही अच्छी है। ध्रुव महाराज, एक शुद्ध वैष्णव के रूप में, यह सब बहुत अच्छी तरह से जानते थे, और उन्होंने इसमें सवारी करने से पहले साथियों और विमान को अपना सम्मान अर्पित किया। लेकिन इस बीच, उनका शरीर आध्यात्मिक अस्तित्व में बदल गया, और इसलिए यह पिघले हुए सोने की तरह चमकीला था। इस तरह वह भी विष्णुलोक के अन्य उपकरणों के साथ एक हो गए।

मायावादी दार्शनिक कल्पना नहीं कर सकते कि यह एकता विभिन्न विविधताओं में भी कैसे प्राप्त की जा सकती है। एकता के बारे में उनका विचार यह है कि कोई विविधता नहीं है। इसलिए वे अवैयक्तिकतावादी बन गए हैं। जैसे शिशुमार, विष्णुलोक या ध्रुवलोक इस भौतिक दुनिया से पूरी तरह अलग हैं, वैसे ही इस दुनिया में एक विष्णु मंदिर भी इस भौतिक दुनिया से पूरी तरह से अलग है। जैसे ही हम मंदिर में होते हैं हमें यह अच्छी तरह से पता होना चाहिए कि हम भौतिक दुनिया से अलग स्थित हैं। मंदिर में, भगवान विष्णु, उनका सिंहासन, उनका कमरा और मंदिर से जुड़ी अन्य सभी चीजें पारलौकिक हैं। तीन तरीके - सत्व-गुण, रजो-गुण और तमो-गुण - मंदिर में प्रवेश नहीं करते हैं। इसलिए कहा जाता है कि जंगल में रहना अच्छे तरीके का है, शहर में रहना जुनून के तरीके का है, और वेश्यालय, शराब की दुकान या बूचड़खाने में रहना अज्ञानता के तरीके का है, लेकिन मंदिर में रहने का मतलब वैकुंठलोक में रहना है। मंदिर में सब कुछ भगवान विष्णु या कृष्ण की तरह पूजनीय है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)