श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  4.12.26 
अनास्थितं ते पितृभिरन्यैरप्यङ्ग कर्हिचित् ।
आतिष्ठ जगतां वन्द्यं तद्विष्णो: परमं पदम् ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजा ध्रुव, आज तक आपके पूर्वजों सहित, अन्य किसी को भी यह दिव्य लोक प्राप्त नहीं हुआ है। यह विष्णुलोक, जहाँ विष्णु निवास करते हैं, सबसे ऊपर है। यह ब्रह्माण्ड के सभी निवासियों द्वारा पूज्य है। हमारे साथ आइए और वहाँ शाश्वत वास करें।
 
हे राजा ध्रुव, आज तक आपके पूर्वजों सहित, अन्य किसी को भी यह दिव्य लोक प्राप्त नहीं हुआ है। यह विष्णुलोक, जहाँ विष्णु निवास करते हैं, सबसे ऊपर है। यह ब्रह्माण्ड के सभी निवासियों द्वारा पूज्य है। हमारे साथ आइए और वहाँ शाश्वत वास करें।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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