सुनन्दनन्दावूचतु:
भो भो राजन्सुभद्रं ते वाचं नोऽवहित: शृणु ।
य: पञ्चवर्षस्तपसा भवान्देवमतीतृपत् ॥ २३ ॥
अनुवाद
विष्णु के दोनों विश्वस्त पार्षद सुनंद और नंद ने कहा: हे राजन, आपका कल्याण हो। कृपया हम जो कहें, उसे ध्यान से सुनें। जब आप पाँच वर्ष के थे, तब आपने कठिन तपस्या की थी, और इस प्रकार आप पुरुषोत्तम परमेश्वर को अत्यंत प्रसन्न कर लेने में सफल रहे।
Sunanda and Nanda, the two trusted ministers of Viṣṇu, said: O King, may you be blessed. Please listen carefully to what we say. When you were five years old, you performed severe penance and by that you greatly pleased the Supreme Personality of Godhead.
तात्पर्य
ध्रुव महाराज के लिए जो संभव था वह किसी के लिए भी संभव है। किसी भी पाँच वर्ष के बच्चे को प्रशिक्षित किया जा सकता है, और बहुत ही कम समय में कृष्ण भावना की प्राप्ति से उसका जीवन सफल हो जायेगा। दुर्भाग्यवश, यह प्रशिक्षण पूरी दुनिया में अनुपस्थित है। कृष्ण भावना आन्दोलन के नेताओं के लिए दुनिया के अलग-अलग भागों में पाँच वर्ष की उम्र के बच्चों को प्रशिक्षित करने के लिए शैक्षणिक संस्थान शुरू करना आवश्यक है। इस तरह के बच्चे न तो समाज के बिगड़े हुए बच्चे या हिप्पी बनेंगे बल्कि वे सभी भगवान के भक्त बन सकते हैं। फिर दुनिया की काया स्वतः बदल जाएगी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥