वैकुंठ दुनिया में सभी जीवित इकाइयाँ पूर्ण ईश्वर से एकता में हैं क्योंकि वे कभी भी उनके आदेशों का उल्लंघन नहीं करते हैं। यहाँ भौतिक दुनिया में, हालाँकि, वे सम्मत नहीं हैं, सहमत नहीं हैं, लेकिन हमेशा असम्मत, असहमत हैं। जीवन का यह मानवीय रूप पूर्ण प्रभु के आदेशों के लिए सहमत होने के लिए प्रशिक्षित होने का एक मौका है। समाज में इस प्रशिक्षण को लाने के लिए कृष्ण चेतना आंदोलन का मिशन है। जैसा कि भगवद-गीता में कहा गया है, भौतिक प्रकृति के नियम बहुत सख्त हैं; भौतिक प्रकृति के कठोर नियमों को कोई भी पार नहीं कर सकता है। लेकिन जो समर्पित आत्मा बन जाता है और पूर्ण प्रभु के आदेश से सहमत होता है, वह उन कठोर नियमों को आसानी से पार कर सकता है। ध्रुव महाराज का उदाहरण बहुत उपयुक्त है। पूर्ण ईश्वर के आदेशों से सहमत होने और ईश्वर के प्रति प्रेम विकसित करने से, ध्रुव को भगवान विष्णु के गोपनीय सेवकों से आमने-सामने मिलने का मौका मिला। ध्रुव महाराज के लिए जो संभव था वह हर किसी के लिए संभव है। जो कोई भी भक्ति सेवा में बहुत गंभीरता से संलग्न होता है, वह समय के साथ, मानव जीवन के पूर्णता को प्राप्त कर सकता है।
