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श्लोक 4.12.21  |
विज्ञाय तावुत्तमगायकिङ्करा-
वभ्युत्थित: साध्वसविस्मृतक्रम: ।
ननाम नामानि गृणन्मधुद्विष:
पार्षत्प्रधानाविति संहताञ्जलि: ॥ २१ ॥ |
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| अनुवाद |
| यह देखकर कि ये असाधारण पुरुष भगवान के प्रत्यक्ष सेवक हैं, ध्रुव महाराज तुरंत उठ खड़े हुए। किन्तु हड़बड़ाहट में जल्दी के कारण वे उचित रीति से उनका स्वागत करना भूल गए। अतः उन्होंने हाथ जोड़कर केवल नमस्कार किया और प्रभु के पवित्र नामों की महिमा का जप करने लगे। |
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| यह देखकर कि ये असाधारण पुरुष भगवान के प्रत्यक्ष सेवक हैं, ध्रुव महाराज तुरंत उठ खड़े हुए। किन्तु हड़बड़ाहट में जल्दी के कारण वे उचित रीति से उनका स्वागत करना भूल गए। अतः उन्होंने हाथ जोड़कर केवल नमस्कार किया और प्रभु के पवित्र नामों की महिमा का जप करने लगे। |
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