श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  4.12.19 
स ददर्श विमानाग्र्यं नभसोऽवतरद् ध्रुव: ।
विभ्राजयद्दश दिशो राकापतिमिवोदितम् ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
जैसे ही उनकी मुक्ति के लक्षण दिखाई दिए, उन्होंने देखा कि एक बेहद खूबसूरत हवाई जहाज आसमान से उतर रहा था, मानो चमकता हुआ चाँद दसों दिशाओं को रोशन करते हुए नीचे आ रहा हो।
 
As soon as the signs of his liberation appeared, he saw a very beautiful aircraft descending from the sky, as if the brilliant full moon was coming down illuminating all the ten directions.
तात्पर्य
अधिगृहीत ज्ञान के भिन्न-भिन्न स्तर हैं—साक्षात ज्ञान, आचार्यों से प्राप्त ज्ञान, पारलौकिक ज्ञान, इन्द्रियों से परे ज्ञान, और अंत में आध्यात्मिक ज्ञान। जब कोई व्यक्ति अवरोही प्रक्रिया से ज्ञान अर्जित करने की अवस्था से ऊपर उठ जाता है, तो वह तुरंत पारलौकिक प्लेटफ़ॉर्म पर आसीन हो जाता है। ध्रुव महाराज, भौतिक जीवन की अवधारणा से मुक्त होकर, पारलौकिक ज्ञान में स्थित थे और एक पारलौकिक हवाई जहाज की उपस्थिति को समझ सकते थे जो पूर्ण चांदनी की तरह चमकदार था। यह ज्ञान की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष धारणा की अवस्थाओं में संभव नहीं है। ऐसा ज्ञान भगवान का एक विशेष अनुग्रह है। हालाँकि, भक्ति सेवा, या कृष्ण चेतना में उन्नति करने की क्रमिक प्रक्रिया द्वारा, कोई भी इस ज्ञान के मंच तक पहुँच सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)