श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  4.12.18 
भक्तिं हरौ भगवति प्रवहन्नजस्र-
मानन्दबाष्पकलया मुहुरर्द्यमान: ।
विक्लिद्यमानहृदय: पुलकाचिताङ्गो
नात्मानमस्मरदसाविति मुक्तलिङ्ग: ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
दिव्य आनन्द के कारण उनकी आँखों से अविरत आँसू बहने लगे, उनका हृदय पिघल गया और पूरे शरीर में कंपकंपी और रोम-रोम खड़े हो गए। भक्ति की समाधि में पहुँचकर ध्रुव महाराज ने अपने शारीरिक अस्तित्व को पूरी तरह से भूल गए और तुरंत ही भौतिक बंधन से मुक्त हो गए।
 
Tears flowed incessantly from his eyes because of transcendental bliss, his heart melted, and his whole body trembled and thrilled. Upon reaching a state of devotional trance, Dhruva Maharaja completely forgot his bodily existence and was instantly liberated from material bondage.
तात्पर्य
ध्यान, कीर्तन, स्मरण, भगवान की आराधना आदि जैसी प्रकार-भेद से नौ प्रकार की भक्ति में लगातार लगे रहने से भक्त के शरीर में अलग-अलग देह परिवर्तन होते हैं। देह के ये आठ परिवर्तन जो इस बात के द्योतक हैं कि भक्त अपनी ही अंतरात्मा में मुक्त हो चुका है, अष्ट-सात्विक-विकार कहलाते हैं। जब कोई भक्त अपनी देह को पूरी तरह भूल जाता है, तो यह समझ लेना चाहिए कि वह मुक्त हो गया है। वह अब शरीर के पिंजरे में कैद नहीं रहा। एक उदाहरण यह दिया गया है कि जब नारियल बिलकुल सूख जाता है तब नारियल के खोल के अंदर का गूदा खोल और बाहरी आवरण की जकड़ से मुक्त हो जाता है। सूखे नारियल को हिलाने पर यह सुनाई देता है कि अंदर का गूदा खोल या आवरण से अब नहीं जुड़ा हुआ है। उसी प्रकार जब कोई भक्ति में पूरी तरह लीन हो जाता है तो वह सूक्ष्म और स्थूल देहों, दो भौतिक आवरणों से पूरी तरह कट जाता है। ध्रुव महाराज निरंतर भक्ति करते रहने से वास्तव में जीवन की इस अवस्था को प्राप्त हुए। उन्हें पहले ही महा-भागवत कहा जा चुका है, क्योंकि जब तक कोई महा-भागवत या प्रथम श्रेणी का शुद्ध भक्त नहीं बनता, तब तक ये लक्षण दिखाई नहीं देते। भगवान चैतन्य ने ये सभी लक्षण प्रदर्शित किए। ठाकुर हरिदास ने भी इन्हें प्रदर्शित किया, और ऐसे बहुत से शुद्ध भक्त हैं जिन्होंने इस प्रकार के देह परिवर्तन प्रकट किए। इनका अनुकरण नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि जब कोई वास्तव में उन्नत हो जाता है, तो ये लक्षण प्रदर्शित होते हैं। उस समय यह समझ लेना चाहिए कि भक्त भौतिक रूप से मुक्त है। निश्चित ही, भक्ति की शुरुआत से ही मुक्ति का मार्ग तुरंत खुल जाता है, जैसे पेड़ से लिया गया नारियल तुरंत सूखना शुरु कर देता है, बस खोल और गूदे को एक दूसरे से अलग होने में समय लगता है।

इस श्लोक में एक महत्वपूर्ण शब्द मुक्त-लिङ्ग है। मुक्त का अर्थ "मुक्त" और लिङ्ग का अर्थ "सूक्ष्म शरीर" होता है। जब मनुष्य की मृत्यु होती है, तो वह स्थूल शरीर छोड़ देता है, परंतु मन, बुद्धि और अहंकार का सूक्ष्म शरीर उसे एक नए शरीर में ले जाता है। वर्तमान शरीर में रहते हुए, वही सूक्ष्म शरीर उसे जीवन की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में (उदाहरण के लिए, बचपन से boyhood) मानसिक विकास के द्वारा ले जाता है। एक शिशु की मानसिक स्थिति एक लड़के से भिन्न होती है, एक लड़के की मानसिक स्थिति एक युवक से भिन्न होती है, और एक युवक की मानसिक स्थिति एक वृद्ध व्यक्ति से भिन्न होती है। अतः मृत्यु के समय शरीर बदलने की प्रक्रिया सूक्ष्म शरीर के कारण होती है: मन, बुद्धि और अहंकार आत्मा को एक स्थूल शरीर से दूसरे में ले जाते हैं। इसे आत्मा का भ्रमण (ट्रांस माइग्रेशन) कहते हैं। लेकिन एक और अवस्था होती है, जब कोई सूक्ष्म शरीर से भी मुक्त हो जाता है; उस समय जीव सक्षम और परलोक या अध्यात्मिक जगत में स्थानांतरित होने के लिए पूर्णत: तैयार होता है।

श्री ध्रुव महाराज के देह परिवर्तनों का वर्णन यह स्पष्ट करता है कि वह अध्यात्मिक जगत में स्थानांतरित होने के लिए पूर्णत: योग्य बन गए थे। सूक्ष्म और स्थूल शरीरों के बीच के अंतर को कोई प्रतिदिन भी अनुभव कर सकता है: सपने में किसी का स्थूल शरीर बिस्तर पर पड़ा रहता है जबकि सूक्ष्म शरीर आत्मा को, जीव को, किसी दूसरे वातावरण में ले जाता है। परंतु स्थूल शरीर का होना जारी रहना है, इसलिए सूक्ष्म शरीर वापस आता है और वर्तमान स्थूल शरीर में बस जाता है। इसलिए सूक्ष्म शरीर से भी मुक्त होना पड़ता है। इस मुक्ति को मुक्त-लिङ्ग कहते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)