इस श्लोक में एक महत्वपूर्ण शब्द मुक्त-लिङ्ग है। मुक्त का अर्थ "मुक्त" और लिङ्ग का अर्थ "सूक्ष्म शरीर" होता है। जब मनुष्य की मृत्यु होती है, तो वह स्थूल शरीर छोड़ देता है, परंतु मन, बुद्धि और अहंकार का सूक्ष्म शरीर उसे एक नए शरीर में ले जाता है। वर्तमान शरीर में रहते हुए, वही सूक्ष्म शरीर उसे जीवन की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में (उदाहरण के लिए, बचपन से boyhood) मानसिक विकास के द्वारा ले जाता है। एक शिशु की मानसिक स्थिति एक लड़के से भिन्न होती है, एक लड़के की मानसिक स्थिति एक युवक से भिन्न होती है, और एक युवक की मानसिक स्थिति एक वृद्ध व्यक्ति से भिन्न होती है। अतः मृत्यु के समय शरीर बदलने की प्रक्रिया सूक्ष्म शरीर के कारण होती है: मन, बुद्धि और अहंकार आत्मा को एक स्थूल शरीर से दूसरे में ले जाते हैं। इसे आत्मा का भ्रमण (ट्रांस माइग्रेशन) कहते हैं। लेकिन एक और अवस्था होती है, जब कोई सूक्ष्म शरीर से भी मुक्त हो जाता है; उस समय जीव सक्षम और परलोक या अध्यात्मिक जगत में स्थानांतरित होने के लिए पूर्णत: तैयार होता है।
श्री ध्रुव महाराज के देह परिवर्तनों का वर्णन यह स्पष्ट करता है कि वह अध्यात्मिक जगत में स्थानांतरित होने के लिए पूर्णत: योग्य बन गए थे। सूक्ष्म और स्थूल शरीरों के बीच के अंतर को कोई प्रतिदिन भी अनुभव कर सकता है: सपने में किसी का स्थूल शरीर बिस्तर पर पड़ा रहता है जबकि सूक्ष्म शरीर आत्मा को, जीव को, किसी दूसरे वातावरण में ले जाता है। परंतु स्थूल शरीर का होना जारी रहना है, इसलिए सूक्ष्म शरीर वापस आता है और वर्तमान स्थूल शरीर में बस जाता है। इसलिए सूक्ष्म शरीर से भी मुक्त होना पड़ता है। इस मुक्ति को मुक्त-लिङ्ग कहते हैं।
