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श्लोक 4.12.18  |
भक्तिं हरौ भगवति प्रवहन्नजस्र-
मानन्दबाष्पकलया मुहुरर्द्यमान: ।
विक्लिद्यमानहृदय: पुलकाचिताङ्गो
नात्मानमस्मरदसाविति मुक्तलिङ्ग: ॥ १८ ॥ |
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| अनुवाद |
| दिव्य आनन्द के कारण उनकी आँखों से अविरत आँसू बहने लगे, उनका हृदय पिघल गया और पूरे शरीर में कंपकंपी और रोम-रोम खड़े हो गए। भक्ति की समाधि में पहुँचकर ध्रुव महाराज ने अपने शारीरिक अस्तित्व को पूरी तरह से भूल गए और तुरंत ही भौतिक बंधन से मुक्त हो गए। |
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| दिव्य आनन्द के कारण उनकी आँखों से अविरत आँसू बहने लगे, उनका हृदय पिघल गया और पूरे शरीर में कंपकंपी और रोम-रोम खड़े हो गए। भक्ति की समाधि में पहुँचकर ध्रुव महाराज ने अपने शारीरिक अस्तित्व को पूरी तरह से भूल गए और तुरंत ही भौतिक बंधन से मुक्त हो गए। |
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