श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  4.12.18 
भक्तिं हरौ भगवति प्रवहन्नजस्र-
मानन्दबाष्पकलया मुहुरर्द्यमान: ।
विक्लिद्यमानहृदय: पुलकाचिताङ्गो
नात्मानमस्मरदसाविति मुक्तलिङ्ग: ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
दिव्य आनन्द के कारण उनकी आँखों से अविरत आँसू बहने लगे, उनका हृदय पिघल गया और पूरे शरीर में कंपकंपी और रोम-रोम खड़े हो गए। भक्ति की समाधि में पहुँचकर ध्रुव महाराज ने अपने शारीरिक अस्तित्व को पूरी तरह से भूल गए और तुरंत ही भौतिक बंधन से मुक्त हो गए।
 
दिव्य आनन्द के कारण उनकी आँखों से अविरत आँसू बहने लगे, उनका हृदय पिघल गया और पूरे शरीर में कंपकंपी और रोम-रोम खड़े हो गए। भक्ति की समाधि में पहुँचकर ध्रुव महाराज ने अपने शारीरिक अस्तित्व को पूरी तरह से भूल गए और तुरंत ही भौतिक बंधन से मुक्त हो गए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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