श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.12.15 
मन्यमान इदं विश्वं मायारचितमात्मनि ।
अविद्यारचितस्वप्नगन्धर्वनगरोपमम् ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
श्रील ध्रुव महाराज ने अनुभव किया कि यह दृश्य-जगत जीवात्माओं को स्वप्न अथवा मायाजाल के समान मोहित करता रहता है, क्योंकि यह परमेश्वर की बाह्य शक्ति माया की रचना है।
 
श्रील ध्रुव महाराज ने अनुभव किया कि यह दृश्य-जगत जीवात्माओं को स्वप्न अथवा मायाजाल के समान मोहित करता रहता है, क्योंकि यह परमेश्वर की बाह्य शक्ति माया की रचना है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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