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श्लोक 4.12.15  |
मन्यमान इदं विश्वं मायारचितमात्मनि ।
अविद्यारचितस्वप्नगन्धर्वनगरोपमम् ॥ १५ ॥ |
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| अनुवाद |
| श्रील ध्रुव महाराज ने अनुभव किया कि यह दृश्य-जगत जीवात्माओं को स्वप्न अथवा मायाजाल के समान मोहित करता रहता है, क्योंकि यह परमेश्वर की बाह्य शक्ति माया की रचना है। |
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| श्रील ध्रुव महाराज ने अनुभव किया कि यह दृश्य-जगत जीवात्माओं को स्वप्न अथवा मायाजाल के समान मोहित करता रहता है, क्योंकि यह परमेश्वर की बाह्य शक्ति माया की रचना है। |
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