एक शब्द जिसका उपयोग यहाँ बहुत महत्वपूर्ण है - अविकलेंद्रियः, जिसका अर्थ है कि वह इंद्रियों की उत्तेजना से परेशान नहीं थे और न ही उनकी संवेदी शक्ति कम हुई, हालाँकि वर्षों में वह बहुत बूढ़े व्यक्ति थे। चूंकि उन्होंने छत्तीस हजार वर्षों तक दुनिया पर शासन किया, स्वाभाविक रूप से कोई यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि वह बहुत, बहुत बूढ़े हो गए थे, लेकिन वास्तव में उनकी इंद्रियाँ बहुत छोटी थीं - और फिर भी उन्हें इंद्रिय तृप्ति में कोई दिलचस्पी नहीं थी। दूसरे शब्दों में, वह आत्म-नियंत्रित रहे। उन्होंने भौतिकवादी तरीके से अपने कर्तव्यों को पूरी तरह से निभाया। यही महान भक्तों के व्यवहार का तरीका है। भगवान चैतन्य के प्रत्यक्ष शिष्यों में से एक श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी, एक बहुत धनी व्यक्ति के पुत्र थे। हालाँकि उन्हें भौतिक सुख भोगने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, जब उन्हें राज्य के प्रबंधन में कुछ करने का काम सौंपा गया, तो उन्होंने इसे पूरी तरह से किया। श्रील गौरसुंदर ने उन्हें सलाह दी, ''भीतर से, अपने आप को और अपने दिमाग को पूरी तरह से अलग रखें, लेकिन बाहरी रूप से भौतिक कर्तव्यों का पालन करें जैसे उन्हें करने की जरूरत है।'' इस पारलौकिक स्थिति को केवल भक्त ही प्राप्त कर सकते हैं, जैसा कि भगवद-गीता में वर्णित है: जबकि अन्य, जैसे योगी, अपनी इंद्रियों को बलपूर्वक नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं, भक्त, पूर्ण संवेदी शक्तियों के होते हुए भी, उनका उपयोग नहीं करते क्योंकि वे उच्चतर, पारलौकिक गतिविधियों में संलग्न होते हैं।
