इसलिए क्षत्रिय और वैश्य को अपने संचित धन का कम से कम पचास प्रतिशत दान करने की विशेष रूप से सलाह दी जाती है। भगवद्-गीता में यह अनुशंसा की जाती है कि भले ही व्यक्ति त्यागी जीवन-शैली में प्रवेश करता है, फिर भी वह यज्ञ, दान और तपस्या का परित्याग नहीं कर सकता। उन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए। तपस्या त्यागी जीवन-शैली के लिए है; जो लोग सांसारिक गतिविधियों से सेवानिवृत्त हो जाते हैं, उन्हें तपस्या, तप और कठोरता का पालन करना चाहिए। जो लोग भौतिक दुनिया में हैं, क्षत्रिय और वैश्य, उन्हें दान देना चाहिए। ब्रह्मचारी, अपने जीवन की शुरुआत में, विभिन्न प्रकार के यज्ञ करने चाहिए।
ध्रुव महाराज, एक आदर्श राजा के रूप में, दान देने से व्यावहारिक रूप से अपना खजाना खाली कर दिया। राजा का मतलब केवल नागरिकों से कर वसूलना और ऐश्वर्य का उपभोग करने के लिए धन का संचय करना नहीं है। तभी से विश्व राजतंत्र विफल हो गया है जब राजाओं ने नागरिकों से संचित करों से अपनी व्यक्तिगत इंद्रियों को संतुष्ट करना शुरू किया। बेशक, व्यवस्था चाहे राजशाही हो या लोकतंत्र, वही भ्रष्टाचार अभी भी जारी है। इस समय लोकतांत्रिक सरकार में अलग-अलग दल हैं, लेकिन हर कोई अपने पद को बनाए रखने की या अपनी राजनीतिक पार्टी को सत्ता में बनाए रखने की कोशिश में व्यस्त रहता है। राजनेताओं के पास नागरिकों के कल्याण के बारे में सोचने के लिए बहुत कम समय होता है, जिन पर वे आयकर, बिक्री कर और कई अन्य करों के रूप में भारी करों से दमन करते हैं - कभी-कभी लोगों की अस्सी से नब्बे प्रतिशत आय ले ली जाती है और ये कर अधिकारियों और शासकों द्वारा खींचे जाने वाले ऊंचे-ऊंचे वेतन के लिए उदारता से खर्च किए जाते हैं। पहले, नागरिकों से संचित करों को वैदिक साहित्य में निषिद्ध महान यज्ञ करने के लिए खर्च किया जाता था। हालाँकि, इस समय, बलिदान के लगभग सभी रूप बिल्कुल भी संभव नहीं हैं; इसलिए, शास्त्रों में यह अनुशंसा की गई है कि लोगों को संकीर्तन-यज्ञ करना चाहिए। कोई भी गृहस्थ, चाहे उसकी स्थिति कुछ भी हो, बिना खर्च के यह संकीर्तन-यज्ञ कर सकता है। परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठ कर ताली बजा सकते हैं और हरे कृष्ण महामंत्र का जाप कर सकते हैं। किसी न किसी तरह, हर कोई इस तरह के यज्ञ का प्रदर्शन कर सकता है और लोगों को सामान्य रूप से प्रसाद वितरित कर सकता है। यह कलियुग के लिए काफी है। कृष्ण-चेतना आंदोलन इस सिद्धांत पर आधारित है: जितना हो सके उतना हर पल हरे कृष्ण मंत्र का जाप करें, मंदिरों के अंदर और बाहर दोनों जगह, और जहां तक संभव हो, प्रसाद वितरित करें। यह प्रक्रिया राज्य प्रशासकों और देश के धन का उत्पादन करने वालों के सहयोग से तेज की जा सकती है। केवल प्रसाद और संकीर्तन के उदार वितरण से, पूरी दुनिया शांतिपूर्ण और समृद्ध हो सकती है।
वैदिक साहित्य में बताये गये सब प्रकार के भौतिक यज्ञों में देवताओं को अर्पण किये जाते हैं। यह देव पूजन विशेष रूप से अल्प बुद्धि वाले व्यक्तियों के लिए है। दरअसल ऐसे यज्ञों का फल परमेश्वर नारायण को ही मिलता है। भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (5.29) में कहा है: भोक्ताराम यज्ञ-तपसां: वही वास्तव में सभी यज्ञों का उपभोग करने वाले है। इसलिए, उनका नाम यज्ञ-पुरुष है। हालाँकि ध्रुव महाराज एक महान भक्त थे और इन यज्ञों से उनका कोई लेना-देना नहीं था फिर भी उन्होंने अपने नागरिकों को एक उदाहरण प्रदान करने के लिए कई यज्ञ किए और उन्होंने अपना सारा धन दान कर दिया। जब तक वे एक गृहस्थ के रूप में रहे, उन्होंने अपनी इंद्रिय-तृप्ति के लिए एक फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं की। इस श्लोक में शब्द कर्म-फल-प्रदम बहुत महत्वपूर्ण है। भगवान हर किसी को उसकी इच्छा अनुसार विभिन्न प्रकार के कर्म प्रदान करते हैं; वह प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में निवास करने वाला परमात्मा है और वह इतने दयालु और उदार हैं कि वह प्रत्येक व्यक्ति को वह कार्य करने की पूरी सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं जो वह करना चाहता है। फिर उस कार्य का फल भी उस व्यक्ति को ही भोगना पड़ता है। यदि कोई भौतिक प्रकृति का उपभोग करना या उस पर शासन करना चाहता है, तो भगवान उसे पूरी सुविधाएं प्रदान करते हैं, परन्तु वह परिणामी प्रतिक्रियाओं में उलझ जाता है। इसी प्रकार, यदि कोई स्वयं को भक्ति सेवा में पूर्ण रूप से समर्पित करना चाहता है, तो भगवान उसे पूरी सुविधाएँ प्रदान करते हैं और भक्त उसके परिणामों का आनंद लेता है। इसलिए भगवान को कर्म-फल-प्रद कहा जाता है।
