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श्लोक 4.11.33  |
हेलनं गिरिशभ्रातुर्धनदस्य त्वया कृतम् ।
यज्जघ्निवान् पुण्यजनान् भ्रातृघ्नानित्यमर्षित: ॥ ३३ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे मेरे प्रिय ध्रुव, तुमने सोचा कि यक्षों ने तुम्हारे भाई का वध किया है, अतः तुमने बड़ी संख्या में यक्षों को मार डाला है। किन्तु इस कर्म से तुमने शिवजी के भाई और देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर के मन को दुखी कर दिया है। ध्यान रखो कि तुम्हारा यह कार्य कुबेर और शिव दोनों के प्रति अत्यंत अपमानजनक है। |
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| हे मेरे प्रिय ध्रुव, तुमने सोचा कि यक्षों ने तुम्हारे भाई का वध किया है, अतः तुमने बड़ी संख्या में यक्षों को मार डाला है। किन्तु इस कर्म से तुमने शिवजी के भाई और देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर के मन को दुखी कर दिया है। ध्यान रखो कि तुम्हारा यह कार्य कुबेर और शिव दोनों के प्रति अत्यंत अपमानजनक है। |
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