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श्लोक 4.11.32  |
येनोपसृष्टात्पुरुषाल्लोक उद्विजते भृशम् ।
न बुधस्तद्वशं गच्छेदिच्छन्नभयमात्मन: ॥ ३२ ॥ |
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| अनुवाद |
| क्रोध के जाल में फँसे हुए व्यक्ति के लिए इस भौतिक संसार से मुक्ति पाना असंभव है, क्योंकि क्रोधित अवस्था में वह सभी के लिए भय का कारण बन जाता है। |
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| क्रोध के जाल में फँसे हुए व्यक्ति के लिए इस भौतिक संसार से मुक्ति पाना असंभव है, क्योंकि क्रोधित अवस्था में वह सभी के लिए भय का कारण बन जाता है। |
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