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श्लोक 4.11.29  |
तमेनमङ्गात्मनि मुक्तविग्रहे
व्यपाश्रितं निर्गुणमेकमक्षरम् ।
आत्मानमन्विच्छ विमुक्तमात्मदृग्
यस्मिन्निदं भेदमसत्प्रतीयते ॥ २९ ॥ |
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| अनुवाद |
| इसलिए हे ध्रुव, अपना ध्यान अच्युत ब्रह्म परम पुरुष की ओर लगाओ। तुम अपने मूल स्थान में रहते हुए भगवान दर्शन करो। इस प्रकार आत्मसाक्षात्कार द्वारा तुम इस भौतिक अंतर को क्षणिक पाओगे। |
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| इसलिए हे ध्रुव, अपना ध्यान अच्युत ब्रह्म परम पुरुष की ओर लगाओ। तुम अपने मूल स्थान में रहते हुए भगवान दर्शन करो। इस प्रकार आत्मसाक्षात्कार द्वारा तुम इस भौतिक अंतर को क्षणिक पाओगे। |
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